जातक कथा

जातक कथा : बंदर का हृदय

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जातक कथा : बंदर का हृदय

बहुत समय पहले एक विशाल और शांत नदी के किनारे घना वन फैला हुआ था। उस वन में अनेक प्रकार के वृक्ष थे, जिन पर मीठे और रसीले फल लगे रहते थे। वातावरण हमेशा पक्षियों की मधुर चहचहाहट और नदी की कल-कल ध्वनि से गूंजता रहता था। उसी वन में एक अत्यंत चंचल, बुद्धिमान और फुर्तीला बंदर रहता था। वह अकेला था, लेकिन अपने हंसमुख स्वभाव और समझदारी के कारण पूरे वन में प्रसिद्ध था।

बंदर अपना जीवन जंगल के फलों को खाकर आनंदपूर्वक बिताता था। नदी के बीचों-बीच एक सुंदर टापू भी था। उस टापू पर ऐसे दुर्लभ और स्वादिष्ट फल लगते थे, जिनकी मिठास पूरे जंगल में कहीं और नहीं मिलती थी। टापू तक पहुंचने के लिए नदी के बीच एक बड़ी चट्टान थी। बंदर अपनी लंबी छलांगों के सहारे पहले उस चट्टान पर पहुंचता और फिर वहां से टापू तक कूद जाता।

जब भी उसका मन स्वादिष्ट फलों को खाने का होता, वह उसी रास्ते से टापू पर पहुंच जाता और दिनभर वहां फलों का आनंद लेता।
उसी नदी में घड़ियालों का एक जोड़ा भी रहता था। वे दोनों अक्सर नदी के किनारे लेटे हुए बंदर को टापू पर जाते और स्वादिष्ट फलों का आनंद लेते हुए देखा करते थे। बंदर हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ था। रोज मीठे फल खाने के कारण उसका शरीर मजबूत और चमकदार दिखाई देता था।

एक दिन मादा घड़ियाल ने अपने पति से कहा, “प्रिय, यह बंदर प्रतिदिन इतने मीठे फल खाता है। सोचो, उसका हृदय कितना स्वादिष्ट और मीठा होगा! यदि तुम सचमुच मुझसे प्रेम करते हो, तो उसका हृदय लाकर मुझे खिलाओ।”
नर घड़ियाल अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था। वह उसकी इच्छा पूरी करना चाहता था। उसने मन ही मन बंदर को पकड़ने की योजना बना ली।

अगले दिन सुबह जब बंदर हमेशा की तरह टापू पर गया और वहां फलों का आनंद लेने लगा, तब नर घड़ियाल चुपचाप नदी में तैरता हुआ उस बड़ी चट्टान के नीचे जाकर छिप गया, जो टापू और नदी के किनारे के बीच थी। उसका इरादा था कि जैसे ही बंदर शाम को लौटेगा, वह उसे पकड़ लेगा।

पूरा दिन बीत गया। सूर्य अस्त होने लगा और बंदर अपने घर लौटने के लिए तैयार हुआ। वह खुशी-खुशी टापू से चट्टान की ओर बढ़ा, लेकिन जैसे ही उसकी नजर चट्टान पर पड़ी, उसे कुछ अजीब लगा। वह बुद्धिमान था और छोटी-सी बात भी तुरंत समझ जाता था। उसने ध्यान से देखा कि चट्टान का आकार कुछ बदला हुआ प्रतीत हो रहा है।

तुरंत उसके मन में शंका उत्पन्न हुई। उसने सोचा, “यह चट्टान तो हमेशा एक जैसी दिखाई देती थी। आज इसमें परिवर्तन क्यों लग रहा है? अवश्य ही कोई खतरा है।”
सच्चाई जानने के लिए बंदर ने एक चाल चली। वह दूर खड़ा होकर ऊंची आवाज में बोला, “हे चट्टान मित्र! आज तुम इतनी शांत क्यों हो? क्या तुम मेरे अभिवादन का उत्तर नहीं दोगी?”

नर घड़ियाल ने सोचा कि शायद बंदर रोज चट्टान से बातें करता होगा। अपनी चालाकी दिखाने के लिए उसने तुरंत अपनी आवाज बदलकर उत्तर दिया, “मित्र! मैं यहीं हूं। आज बस थोड़ा चुप हूं।”
इतना सुनते ही बंदर की शंका सत्य सिद्ध हो गई। अब उसे पूरा विश्वास हो गया कि वहां कोई घड़ियाल छिपा हुआ है।
कुछ देर के लिए बंदर चिंता में पड़ गया। वह टापू पर हमेशा नहीं रह सकता था, क्योंकि वहां भोजन सीमित था और अंततः उसे अपने वन में लौटना ही था। उसने तुरंत अपनी बुद्धि का प्रयोग करना शुरू किया।

फिर वह हंसते हुए बोला, “अरे मित्र! तुम तो घड़ियाल हो। आखिर तुम मुझसे क्या चाहते हो?”
अब घड़ियाल को लगा कि उसका रहस्य खुल चुका है। वह पानी से बाहर आया और गर्व से बोला, “हाँ, मैं घड़ियाल हूं। मेरी पत्नी तुम्हारा हृदय खाना चाहती है, इसलिए मैं तुम्हें पकड़ने आया हूं।” घड़ियाल की बात सुनकर भी बंदर घबराया नहीं। उसने तुरंत एक नई युक्ति सोच ली। वह शांत स्वर में बोला, “ओह! बस इतनी-सी बात? यदि तुम्हारी पत्नी मेरा हृदय खाना चाहती है, तो मैं खुशी-खुशी तुम्हें अपना शरीर दे दूंगा। लेकिन उसके लिए तुम्हें अपना मुंह पूरा खोलना होगा, ताकि मैं सीधे उसमें कूद सकूं।”

घड़ियाल यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसे लगा कि बंदर डरकर आत्मसमर्पण कर रहा है। वह अपनी जीत पर गर्व करने लगा। उसे यह पता नहीं था कि बंदर कोई नई चाल चल रहा है। बंदर जानता था कि जब घड़ियाल अपना विशाल मुंह खोलता है, तब उसकी आंखें कुछ क्षणों के लिए बंद हो जाती हैं।

जैसे ही घड़ियाल ने अपना बड़ा-सा मुंह खोला, उसकी आंखें बंद हो गईं। उसी क्षण बंदर बिजली की तेजी से उछला। उसने पहली छलांग घड़ियाल के सिर पर लगाई और दूसरी लंबी छलांग सीधे नदी के किनारे पर मार दी।
कुछ ही क्षणों में वह सुरक्षित जंगल में पहुंच चुका था।

घड़ियाल जब तक अपनी आंखें खोलता, तब तक बंदर उसकी पहुंच से बहुत दूर जा चुका था। वह क्रोध और शर्म से पानी में तड़पता रह गया। बंदर एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया और हंसते हुए बोला, “मूर्ख घड़ियाल! केवल बल से नहीं, बुद्धि से भी काम लेना चाहिए। जिसने अपनी बुद्धि खो दी, वह कभी सफल नहीं हो सकता।”

यह सुनकर घड़ियाल सिर झुकाकर चुपचाप नदी में लौट गया। इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि कठिन से कठिन संकट में भी धैर्य और बुद्धिमानी से काम लेने वाला व्यक्ति स्वयं को बचा सकता है। केवल शक्ति नहीं, बल्कि सूझ-बूझ और चतुराई ही सच्ची विजय दिलाती है।

बुद्धिमान मुर्गा : जातक कथा

बहुत समय पहले एक घने और शांत वन में असंख्य पक्षी और जीव-जंतु निवास करते थे। उसी वन में मुर्गों का एक बड़ा समूह भी रहता था। उन सभी मुर्गों के बीच एक अत्यंत सुंदर, हृष्ट-पुष्ट और बुद्धिमान मुर्गा था। उसका शरीर मजबूत था, उसके पंख चमकीले थे और उसकी लाल कलगी दूर से ही पहचान में आ जाती थी। वह केवल रूप और बल में ही श्रेष्ठ नहीं था, बल्कि अपनी समझदारी और सावधानी के कारण भी सभी में प्रसिद्ध था।

उस मुर्गे के साथ उसके सैकड़ों रिश्तेदार और साथी उसी वन में रहते थे। वे सभी दिनभर जंगल में दाने चुगते, पेड़ों के नीचे घूमते और शाम होते ही ऊंची डालियों पर जाकर बैठ जाते। लेकिन उसी वन में एक खतरनाक जंगली बिल्ली भी रहती थी। वह बहुत चालाक और क्रूर थी। मौका मिलते ही वह किसी न किसी पक्षी का शिकार कर लेती थी।

धीरे-धीरे उस बिल्ली ने मुर्गे के कई रिश्तेदारों को मारकर खा लिया। पूरा मुर्गों का समूह उससे भयभीत रहने लगा। लेकिन बिल्ली की नजर अब उस बड़े और मोटे मुर्गे पर थी। उसे लगता था कि यदि वह उस मुर्गे को पकड़ ले, तो कई दिनों तक उसे भोजन की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

बिल्ली ने कई बार उसे पकड़ने का प्रयास किया। कभी वह झाड़ियों में छिप जाती, कभी रात के समय दबे पांव पेड़ के पास पहुंचती, लेकिन वह मुर्गा अत्यंत सतर्क था। वह हमेशा ऊंची डालियों पर बैठता और हर आहट पर ध्यान देता था। उसकी बुद्धिमानी के कारण बिल्ली हर बार असफल हो जाती।

अंततः बिल्ली ने सोचा कि बल से काम नहीं बन रहा, इसलिए अब उसे छल और मीठी बातों का सहारा लेना चाहिए।
एक दिन सुबह-सुबह वह उस पेड़ के नीचे पहुंची, जिस पर मुर्गा बैठा हुआ था। उस समय वन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी और सूर्य की किरणें पेड़ों के बीच से छनकर नीचे आ रही थीं। मुर्गा आराम से डाल पर बैठा चारों ओर देख रहा था।

बिल्ली ने अपनी आवाज को मधुर बनाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “हे सुंदर मुर्गे! मैं तुमसे बहुत प्रेम करती हूं। तुम्हारी सुंदरता और तुम्हारे चमकदार पंखों ने मेरा मन मोह लिया है। तुम्हारी लाल कलगी तो सचमुच बहुत आकर्षक है। मैं चाहती हूं कि तुम मुझे अपनी पत्नी स्वीकार कर लो। नीचे आ जाओ, ताकि मैं तुम्हारी सेवा कर सकूं।”

मुर्गा बिल्ली की चाल तुरंत समझ गया। वह जानता था कि यह वही क्रूर बिल्ली है जिसने उसके कई रिश्तेदारों को मार डाला है। फिर भी उसने शांत रहकर उत्तर दिया।
वह मुस्कुराया और बोला—
“ओ बिल्ली! तेरे हैं चार पैर,
मेरे हैं दो।
ढूंढ ले कोई और वर,
क्योंकि पक्षी और जंगली जानवर
कभी एक जैसे नहीं होते।”

मुर्गे की बात सुनकर बिल्ली थोड़ी शर्मिंदा हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह फिर मीठे शब्दों में बोली, “तुम मुझे गलत समझ रहे हो। अब मैं बदल चुकी हूं। मैं तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचाऊंगी। मैं सचमुच तुमसे प्रेम करती हूं।”
लेकिन बुद्धिमान मुर्गा उसकी बातों में आने वाला नहीं था। उसने गंभीर स्वर में कहा—
“ओ बिल्ली! तूने मेरे कई रिश्तेदारों का खून पिया है।

तूने कभी किसी पर दया नहीं की। फिर मैं कैसे विश्वास कर लूं कि आज अचानक तेरे मन में प्रेम जाग गया है? जो दूसरों के प्राण लेकर जीता है, उसके शब्दों पर भरोसा करना मूर्खता है।”
मुर्गे की सच्ची और कटु बात सुनकर बिल्ली का सिर शर्म से झुक गया। उसे समझ आ गया कि उसकी चालाकी इस बुद्धिमान मुर्गे के सामने नहीं चल सकती।

अपमानित होकर वह तुरंत वहां से चली गई। उस दिन के बाद उसने कभी उस पेड़ के आसपास आने की हिम्मत नहीं की।
मुर्गा अपनी बुद्धिमानी और सतर्कता के कारण सुरक्षित रहा और उसके साथी भी उसकी प्रशंसा करने लगे। सभी को समझ आ गया कि मीठी बातों के पीछे छिपे छल को पहचानना बहुत जरूरी होता है।

इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि शत्रु चाहे कितनी भी मीठी बातें क्यों न करे, उसकी असली प्रकृति को कभी नहीं भूलना चाहिए। बुद्धिमानी और सतर्कता ही मनुष्य को संकट से बचाती है।

चमड़े की धोती : जातक कथा

बहुत समय पहले की बात है। एक नगर के बाहर एक आश्रम में अनेक साधु और तपस्वी निवास करते थे। वे साधारण वस्त्र पहनते, सादा भोजन करते और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। उन्हीं साधुओं के बीच एक ऐसा साधु भी रहता था, जिसके मन में धीरे-धीरे अहंकार घर कर चुका था। बाहर से वह स्वयं को तपस्वी और त्यागी दिखाता था, लेकिन भीतर ही भीतर उसे अपने सम्मान और श्रेष्ठता का बड़ा अभिमान था।

एक दिन एक धनी व्यक्ति आश्रम में आया। उसने उस साधु को प्रसन्न होकर चमड़े की बनी एक सुंदर और दुर्लभ धोती दान में दे दी। उस समय ऐसे वस्त्र बहुत मूल्यवान माने जाते थे। साधु ने जैसे ही वह चमड़े की धोती पहनी, उसके मन में घमंड और भी बढ़ गया। अब वह स्वयं को अन्य साधुओं से कहीं अधिक महान और विशेष समझने लगा।

धीरे-धीरे उसका व्यवहार बदलने लगा। वह साधारण साधुओं की ओर तुच्छ दृष्टि से देखने लगा। उसे लगता था कि उसके पास जो अनोखा वस्त्र है, वह उसे दूसरों से श्रेष्ठ बनाता है। जहां भी जाता, लोग उसकी चमड़े की धोती को देखकर आश्चर्य करते और यही बात उसके अहंकार को और बढ़ा देती।

एक दिन वह साधु उसी चमड़े की धोती को पहनकर भिक्षा मांगने के लिए नगर की ओर निकला। वह रास्ते भर गर्व से सिर ऊंचा करके चल रहा था। उसके मन में यह भावना थी कि लोग उसे देखकर अवश्य प्रभावित होंगे।
रास्ते में उसे एक बड़ा और शक्तिशाली जंगली भेड़ दिखाई दिया। भेड़ कुछ दूरी पर खड़ा था।

उसका शरीर मजबूत था और उसके नुकीले सींग बहुत भयानक लग रहे थे। साधु जैसे ही उसके पास पहुंचा, भेड़ अचानक कुछ कदम पीछे हट गया। फिर उसने अपना सिर नीचे झुकाना शुरू किया और बार-बार जमीन पर पैर पटकने लगा।
घमंडी साधु ने यह दृश्य देखा तो उसके मन में तुरंत भ्रम उत्पन्न हो गया। उसने सोचा, “देखो, यह जंगली भेड़ भी मेरी महानता को पहचान गया है। यह अवश्य ही मुझे प्रणाम करने के लिए सिर झुका रहा है। आखिर मैं कोई साधारण साधु थोड़े ही हूं। मेरे पास यह अद्भुत चमड़े का वस्त्र है, इसलिए सभी मेरा सम्मान करते हैं।”

उसी समय वहां से एक अनुभवी व्यापारी गुजर रहा था। उसने दूर से ही भेड़ की हरकतों को देखकर खतरे को समझ लिया। वह तुरंत ऊंची आवाज में साधु को चेतावनी देते हुए बोला—
“हे ब्राह्मण! किसी जंगली जानवर पर कभी विश्वास मत करो। वे पीछे हटकर झुकते अवश्य हैं, लेकिन केवल आक्रमण करने के लिए। सावधान हो जाओ, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।”

लेकिन अहंकार में डूबे उस साधु ने व्यापारी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगा कि व्यापारी उसकी महानता को समझ नहीं पा रहा है। व्यापारी की चेतावनी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक वह जंगली भेड़ पूरी शक्ति से साधु की ओर दौड़ा। उसके नुकीले सींग सीधे साधु के पेट में जा धंसे। साधु जोर से चिल्लाता हुआ जमीन पर गिर पड़ा। उसके शरीर से रक्त बहने लगा।
कुछ ही क्षणों में उसका घमंड चूर-चूर हो गया। वह समझ चुका था कि उसने अपनी मूर्खता और अहंकार के कारण खतरे को पहचानने में भूल कर दी। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। थोड़ी ही देर में उसने वहीं प्राण त्याग दिए।

राहगीर और व्यापारी यह दुखद दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। सभी लोग यही कहने लगे कि अहंकार मनुष्य की बुद्धि को नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, वह अक्सर सत्य और खतरे दोनों को पहचानने की क्षमता खो बैठता है।
इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि घमंड मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। अहंकार के कारण व्यक्ति सही सलाह को अनदेखा कर देता है और अंततः स्वयं अपने विनाश का कारण बनता है।

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जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।

रचनाकार: जातक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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