जातक कथा

जातक कथा: घतकुमार

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जातक कथा: घतकुमार

बहुत समय पहले वाराणसी में घतकुमार नाम का एक राजा राज्य करता था। वह न्यायप्रिय, बुद्धिमान और शांत स्वभाव का शासक था। उसकी प्रजा उससे अत्यंत प्रेम करती थी, क्योंकि वह सदैव धर्म और न्याय के मार्ग पर चलता था। उसके राज्य में सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण था।

राजा घतकुमार के दरबार में अनेक मंत्री और अधिकारी कार्य करते थे। उनमें से एक मंत्री अत्यंत चतुर तो था, लेकिन उसका स्वभाव अहंकारी और दुष्ट था। वह अपने पद का दुरुपयोग करता और दूसरों के साथ अनुचित व्यवहार करता था। धीरे-धीरे उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि उसने राजा के हरम में भी अनुचित आचरण करना शुरू कर दिया।

जब यह बात राजा घतकुमार को ज्ञात हुई, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने समझ लिया कि ऐसा व्यक्ति राज्य के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। इसलिए उसने उस मंत्री को कठोर दंड देते हुए राज्य से निष्कासित कर दिया।

अपमानित मंत्री के मन में प्रतिशोध की आग जल उठी। वह वाराणसी छोड़कर श्रावस्ती पहुंचा, जहां वंक नाम का एक शक्तिशाली राजा राज्य करता था। मंत्री ने राजा वंक के सामने स्वयं को पीड़ित और निर्दोष बताकर उसकी शरण मांग ली।
राजा वंक ने उसे अपने यहां स्थान दे दिया।

कुछ समय बीतने के बाद उस मंत्री ने धीरे-धीरे राजा वंक का विश्वास जीत लिया। फिर उसने वाराणसी राज्य के गुप्त भेद, उसकी कमजोरियां, सेना की स्थिति और राजकीय योजनाओं की जानकारी राजा वंक को देना शुरू कर दिया।
इन रहस्यों को जानकर राजा वंक के मन में वाराणसी को जीतने की इच्छा जाग उठी। उसने सोचा कि यह अवसर अत्यंत अनुकूल है। अतः उसने अपनी विशाल सेना तैयार की और अचानक वाराणसी पर आक्रमण कर दिया।

मंत्री द्वारा दी गई गुप्त सूचनाओं के कारण वाराणसी की सेना अधिक समय तक मुकाबला नहीं कर सकी। अंततः राजा वंक ने वाराणसी पर अधिकार कर लिया और राजा घतकुमार को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया।
राज्य हार जाने के बाद भी घतकुमार के चेहरे पर न क्रोध था, न भय और न ही निराशा।

उस रात राजा वंक स्वयं कारागार में घतकुमार को देखने गया। उसने सोचा था कि पराजित राजा दुख और भय में डूबा होगा। लेकिन वहां पहुंचकर वह आश्चर्यचकित रह गया।
उसने देखा कि घतकुमार शांत भाव से ध्यान और योग में लीन बैठा है। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति और हल्की मुस्कान थी, मानो उसके साथ कुछ बुरा हुआ ही न हो।

यह दृश्य देखकर राजा वंक के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उसने पूछा, “हे घतकुमार! तुम अपना राज्य हार चुके हो। तुम बंदी बनाकर कारागार में डाल दिए गए हो। फिर भी तुम्हारे चेहरे पर भय या दुख का कोई चिन्ह नहीं है। तुम इस संकट की घड़ी में भी मुस्कुरा क्यों रहे हो?” घतकुमार ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हे वंक! जो बीत चुका है, उसके लिए पश्चाताप करना व्यर्थ है। अतीत को कोई बदल नहीं सकता।

यदि मैं रोऊं, दुख करूं या पछताऊं, तो भी जो हो चुका है, वह नहीं बदलेगा। और जो भविष्य अभी आया ही नहीं, उसके भय में मैं अपने मन को क्यों अशांत करूं?”फिर उसने आगे कहा,
“वृथा है पश्चाताप,
जो बदल नहीं सकता कभी अतीत।
हे वंक!
क्यों करूं मैं ऐसा शोक,
जो न भविष्य बदल सके,
न वर्तमान को सुख दे।”

घतकुमार के इन गहन और शांतिपूर्ण शब्दों ने राजा वंक के हृदय को छू लिया। उसने पहली बार किसी पराजित राजा को इतनी स्थिर बुद्धि और धैर्य के साथ बोलते देखा था।
वह समझ गया कि सच्चा महान व्यक्ति वही है, जो विपत्ति में भी अपने मन को विचलित न होने दे।
राजा वंक घतकुमार के धैर्य, ज्ञान और वैराग्य से अत्यंत प्रभावित हुआ। उसके मन में घतकुमार के प्रति सम्मान उत्पन्न हो गया। उसी क्षण उसने निर्णय लिया कि ऐसे महान व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।

अतः उसने घतकुमार को कारागार से मुक्त कर दिया और सम्मानपूर्वक उसका पूरा राज्य वापस लौटा दिया।
लेकिन अब घतकुमार के मन में राजसत्ता और वैभव के प्रति कोई मोह नहीं बचा था। उसने संसार की नश्वरता को और अधिक गहराई से समझ लिया था।

उसने अपना राज्य अपने परिजनों को सौंप दिया और स्वयं राजमहल तथा सांसारिक सुखों का त्याग कर संन्यासी बन गया। वह वन में जाकर ध्यान, तपस्या और धर्म के मार्ग पर चलने लगा।
इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि बुद्धिमान व्यक्ति विपत्ति में भी धैर्य नहीं खोता। अतीत पर शोक करना व्यर्थ है, क्योंकि उसे बदला नहीं जा सकता। सच्ची शांति वर्तमान को स्वीकार करने और मन को स्थिर रखने में ही है।

आम चोर : जातक कथा

बहुत समय पहले गंगा नदी के शांत किनारे पर एक सन्यासी की कुटिया थी। बाहर से देखने पर वह स्थान अत्यंत पवित्र और शांत दिखाई देता था। कुटिया के चारों ओर हरियाली फैली हुई थी और पास ही एक सुंदर आम का बगीचा भी था। दूर-दूर से लोग उस सन्यासी को तपस्वी समझकर सम्मान देते थे और उसे भिक्षा तथा दान प्रदान करते थे।

किन्तु वास्तव में वह कोई सच्चा साधु नहीं था। वह एक ढोंगी और लालची व्यक्ति था, जिसने केवल लोगों को धोखा देने के लिए सन्यास का वेश धारण किया था। उसके मन में न करुणा थी, न संयम और न ही धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा।
वह अपने आम के बगीचे से अत्यधिक मोह रखता था। दिन-रात उसी की चिंता करता रहता। कोई पक्षी भी यदि आम पर बैठ जाए, तो वह क्रोधित हो उठता। साधु का जीवन त्याग और संतोष का प्रतीक माना जाता है, लेकिन वह ढोंगी सन्यासी हर उस बुरे कर्म में लिप्त था जो एक सच्चे सन्यासी के आचरण के विरुद्ध होता है।

देवताओं के राजा शक्र की दृष्टि जब उस ढोंगी पर पड़ी, तो उन्होंने उसके भीतर छिपे लालच और कपट को समझ लिया। शक्र ने सोचा कि इस व्यक्ति को उसके अहंकार और लालच का उचित पाठ पढ़ाना चाहिए।
एक दिन सुबह ढोंगी सन्यासी भिक्षा मांगने पास के गांव चला गया। वह हमेशा की तरह लोगों के सामने धार्मिक बातें करता और दान प्राप्त करता रहा। उधर उसकी अनुपस्थिति में शक्र वहां पहुंचे।

उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से बगीचे के सारे पके हुए आम तोड़ लिए और उन्हें वहां से गायब कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने पूरे बगीचे को अस्त-व्यस्त कर दिया। पेड़ों की डालियां टूटी हुई प्रतीत होती थीं और ऐसा लग रहा था मानो किसी ने पूरे बगीचे को लूट लिया हो।

शाम के समय जब ढोंगी सन्यासी भिक्षा लेकर अपनी कुटिया में लौटा, तो अपने बगीचे की हालत देखकर उसके होश उड़ गए। उसके सारे आम गायब थे। पेड़ों को देखकर वह क्रोध और दुख से भर उठा। उसका चेहरा विकृत हो गया और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा।

वह वहीं खड़ा होकर सोच ही रहा था कि यह काम किसने किया होगा, तभी उसी रास्ते से एक श्रेष्ठि की चार सुंदर और सज्जन पुत्रियां गुजर रही थीं। वे किसी कार्य से निकली थीं और शांत भाव से अपने मार्ग पर जा रही थीं।

ढोंगी सन्यासी ने उन्हें देखते ही संदेह कर लिया। उसने क्रोध में भरकर उन्हें रोक लिया और ऊंची आवाज में बोला, “रुको! मेरे आम तुम लोगों ने ही चुराए हैं। तुम सब चोर हो!”
अचानक लगाए गए इस झूठे आरोप से वे चारों कन्याएं घबरा गईं। उन्होंने विनम्रता से कहा कि उन्होंने कोई चोरी नहीं की है। वे निर्दोष हैं।

लेकिन ढोंगी सन्यासी अपने क्रोध में अंधा हो चुका था। वह लगातार उन्हें अपमानित करता रहा। तब उन कन्याओं ने उसकी कुटिया के सामने बैठकर शपथ ली कि उन्होंने कभी उसके बगीचे से एक आम भी नहीं तोड़ा।
उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उनके शब्दों में सच्चाई थी।

ढोंगी सन्यासी के पास उनके विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं था। अंततः उसे उन्हें छोड़ना पड़ा। चारों कन्याएं अपमानित और दुखी होकर वहां से चली गईं।
यह सब देखकर शक्र अत्यंत क्रोधित हुए। उन्हें उन निर्दोष कन्याओं का अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि अब उस ढोंगी को कठोर शिक्षा देनी ही होगी।

कुछ ही देर बाद आकाश में भयंकर गर्जना होने लगी। अचानक शक्र ने एक अत्यंत डरावना और विकराल रूप धारण किया। उनका विशाल और भयंकर स्वरूप देखकर पूरा वातावरण कांप उठा।
वे ढोंगी सन्यासी के सामने प्रकट हुए।
उनकी आंखें अग्नि की तरह चमक रही थीं और उनका रूप इतना भयावह था कि ढोंगी सन्यासी भय से कांपने लगा। उसकी सारी अकड़ और घमंड एक क्षण में समाप्त हो गया।

शक्र ने उसे कठोर स्वर में चेतावनी दी कि जो व्यक्ति धर्म का वेश धारण करके छल, लालच और अन्याय करता है, उसका अंत कभी अच्छा नहीं होता। निर्दोष लोगों पर झूठा आरोप लगाना और धर्म का अपमान करना महान पाप है।
यह सुनकर ढोंगी सन्यासी इतना भयभीत हो गया कि वह उसी समय अपनी कुटिया और बगीचा छोड़कर वहां से भाग गया। फिर वह कभी उस स्थान पर लौटकर नहीं आया।

उसके जाने के बाद वहां का वातावरण फिर से शांत और पवित्र हो गया।
इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि केवल साधु का वेश धारण कर लेने से कोई महान नहीं बन जाता। सच्चा धर्म अच्छे आचरण, सत्य और करुणा में होता है। जो लोग निर्दोषों पर झूठे आरोप लगाते हैं और धर्म के नाम पर छल करते हैं, उन्हें अंततः अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है।

गूंगा राजकुमार : जातक कथा

बहुत समय पहले काशी राज्य में एक प्रतापी राजा राज्य करता था। उसकी रानी का नाम चंदादेवी था। रानी अत्यंत शीलवती, धर्मपरायण और सद्गुणों से युक्त थी। राजमहल में धन, वैभव और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी राजा और रानी के जीवन में एक बड़ी कमी थी—उनकी कोई संतान नहीं थी।

संतान न होने के कारण रानी चंदादेवी अत्यंत दुखी रहती थी। उसने अनेक व्रत, पूजा और प्रार्थनाएं कीं। अंततः राज्य और वंश की रक्षा के लिए उसने नियोग की प्राचीन परंपरा के अनुसार एक पुत्र को गर्भ में धारण किया। समय आने पर उसने एक सुंदर और तेजस्वी बालक को जन्म दिया। उसका नाम तेमिय रखा गया।
राजमहल में उत्सव मनाया गया। राजा और रानी अत्यंत प्रसन्न हुए। ज्योतिषियों और विद्वानों ने भविष्यवाणी की कि यह बालक बड़ा होकर एक महान और शक्तिशाली राजा बनेगा।

किन्तु तेमिय कोई साधारण बालक नहीं था। उसके भीतर पूर्वजन्मों की स्मृतियां विद्यमान थीं। जब वह थोड़ा बड़ा हुआ, तब उसने समझ लिया कि राजा बनना केवल सुख और वैभव प्राप्त करना नहीं है। राजा को न्याय करते समय कठोर दंड देने पड़ते हैं, युद्ध करने पड़ते हैं और अनेक बार हिंसा तथा अन्याय का भागी भी बनना पड़ता है।

तेमिय को स्मरण था कि पूर्व जन्मों में राजसत्ता और दंड देने के कारण उसे भयंकर कष्ट भोगने पड़े थे। इसलिए उसके मन में राजगद्दी के प्रति भय और वैराग्य उत्पन्न हो गया। उसने निश्चय किया कि वह कभी राजा नहीं बनेगा। वह संसार के मोह को त्यागकर संन्यास का मार्ग अपनाना चाहता था।

लेकिन वह जानता था कि यदि उसने सीधे-सीधे अपनी इच्छा प्रकट की, तो राजा और रानी उसे कभी संन्यास लेने नहीं देंगे। इसलिए उसने एक विचित्र उपाय सोचा।
उसने गूंगे और अपंग होने का स्वांग रच लिया।
धीरे-धीरे उसने बोलना, चलना और सामान्य व्यवहार करना पूरी तरह बंद कर दिया। वह न किसी से बात करता, न हंसता, न खेलता और न ही किसी कार्य में रुचि दिखाता।

राजवैद्य, विद्वान और ज्योतिषी अनेक प्रकार से उसका परीक्षण करते रहे, लेकिन कोई भी उसकी वास्तविकता को समझ नहीं पाया। सभी को यही लगा कि राजकुमार जन्म से ही गूंगा और अक्रिय है।
इस प्रकार पूरे सोलह वर्ष बीत गए।
अब दरबारियों और मंत्रियों को चिंता होने लगी कि ऐसा राजकुमार भविष्य में राज्य कैसे संभालेगा। अंततः उन्होंने राजा को सलाह दी कि राज्य के हित में तेमिय को जीवित रखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि उसे किसी कब्रिस्तान में ले जाकर गुप्त रूप से मरवा दिया जाए और वहीं दफना दिया जाए।

यह सुनकर राजा और रानी अत्यंत दुखी हुए, लेकिन राज्य और परंपरा के दबाव में वे मौन रहे।
राजा ने सुनंद नामक एक विश्वस्त सेवक को यह कार्य सौंपा।
एक दिन सुनंद तेमिय को रथ पर लादकर नगर से दूर एक सुनसान कब्रिस्तान में ले गया। वहां चारों ओर सन्नाटा था। सूखे पेड़ और वीरान भूमि उस स्थान को और भी भयावह बना रहे थे।
सुनंद ने तेमिय को जमीन पर लिटा दिया और फावड़े से उसके लिए कब्र खोदने लगा।
लेकिन तभी एक अद्भुत घटना हुई।

तेमिय धीरे-धीरे उठकर चुपचाप सुनंद के पीछे जाकर खड़ा हो गया। जब सुनंद ने पीछे मुड़कर देखा, तो वह भय और आश्चर्य से कांप उठा। जिसे वह वर्षों से गूंगा और अपंग समझता था, वह स्वस्थ और सामान्य मनुष्य की तरह उसके सामने खड़ा था।
फिर तेमिय ने शांत और मधुर स्वर में कहा, “भयभीत मत हो सुनंद। मैं न तो गूंगा हूं और न ही अपंग।

मैंने यह स्वांग इसलिए रचा था क्योंकि मैं राजा नहीं बनना चाहता। मैं संसार के मोह और राजसुख से दूर होकर संन्यास का जीवन अपनाना चाहता हूं।” तेमिय के वचनों में ऐसी शांति और सत्य था कि सुनंद का हृदय बदल गया। वह राजकुमार की महानता और वैराग्य से अत्यंत प्रभावित हुआ। उसने तुरंत तेमिय के चरणों में झुककर कहा कि वह भी उसका शिष्य बनना चाहता है।

तेमिय ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, लेकिन उससे पहले उसे एक कार्य सौंपा। उसने कहा, “पहले राजमहल जाओ और मेरे माता-पिता को यहां लेकर आओ। मैं उन्हें सत्य बताना चाहता हूं।”
सुनंद तुरंत महल पहुंचा और राजा-रानी को सारी बात बताई। यह सुनकर वे आश्चर्यचकित रह गए। वे तुरंत अनेक मंत्रियों और प्रजाजनों के साथ कब्रिस्तान पहुंचे।

जब उन्होंने तेमिय को स्वस्थ और तेजस्वी रूप में देखा, तो उनकी आंखों में खुशी और आश्चर्य के आंसू भर आए।
तब तेमिय ने सभी को संसार की नश्वरता, वैराग्य और संन्यास का उपदेश दिया। उसने समझाया कि राजसुख और वैभव क्षणिक हैं, जबकि धर्म और आत्मशांति ही सच्चा सुख प्रदान करते हैं।
उसके वचनों का राजा, रानी और वहां उपस्थित लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा। धीरे-धीरे उनके मन से भी सांसारिक मोह समाप्त होने लगा।

अंततः राजा-रानी सहित अनेक लोगों ने राजवैभव त्याग दिया और संन्यास का मार्ग अपना लिया।
तेमिय बाद में एक महान संन्यासी के रूप में विख्यात हुआ। दूर-दूर से लोग उसके उपदेश सुनने आने लगे और उसके जीवन को त्याग, धैर्य और वैराग्य का आदर्श मानने लगे।
इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि सांसारिक वैभव और शक्ति स्थायी नहीं होते। सच्ची महानता त्याग, आत्मसंयम और सत्य के मार्ग पर चलने में है।

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जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।

रचनाकार: जातक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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