जातक कथा : बौना तीरंदाज
बहुत समय पहले तक्षशिला नगरी शिक्षा और विद्या का महान केंद्र मानी जाती थी। दूर-दूर से विद्यार्थी वहां आकर विभिन्न कलाओं और विद्याओं की शिक्षा प्राप्त करते थे। उन्हीं विद्यार्थियों में एक बौना युवक भी था। उसका शरीर छोटा था, लेकिन उसकी बुद्धि तीव्र और लक्ष्य पर ध्यान अद्भुत था।
उसने तक्षशिला के एक महान गुरु से धनुर्विद्या सीखी। वर्षों की कठिन साधना और अभ्यास के बाद वह इतना कुशल तीरंदाज बन गया कि चलते हुए लक्ष्य को भी बिना चूके भेद सकता था। युद्धकला में उसका कोई मुकाबला नहीं था।
किन्तु संसार अक्सर बाहरी रूप देखकर ही मनुष्य का मूल्यांकन करता है।
जब वह जीविका की तलाश में विभिन्न राज्यों में जाता, तो लोग उसके छोटे कद को देखकर उसका उपहास उड़ाते। कोई उसे देखकर हंसता, तो कोई उसकी ठिठोली करता। किसी को यह जानने की इच्छा नहीं होती कि उसके भीतर कितनी अद्भुत प्रतिभा छिपी हुई है।
धीरे-धीरे बौने को यह समझ आ गया कि लोग योग्यता से अधिक बाहरी रूप और शरीर की बनावट को महत्व देते हैं। उसने निश्चय किया कि यदि संसार उसकी प्रतिभा को सीधे नहीं पहचानता, तो वह कोई दूसरी युक्ति अपनाएगा।
एक दिन घूमते-घूमते उसकी मुलाकात भीमसेन नाम के एक जुलाहे से हुई। भीमसेन अत्यंत लंबा-चौड़ा, बलवान और हृष्ट-पुष्ट युवक था। उसकी कद-काठी देखकर कोई भी उसे वीर योद्धा समझ सकता था, लेकिन वास्तव में वह युद्धकला से बिल्कुल अनजान था।
बौने ने उसे अपने तीरंदाजी और युद्ध कौशल का प्रदर्शन करके दिखाया। उसने ऐसी अद्भुत चालें और शस्त्र-कौशल दिखाए कि भीमसेन आश्चर्यचकित रह गया।
तब बौने ने उससे कहा, “यदि तुम मेरी बात मानो, तो मैं तुम्हें एक महान सेनानी बना सकता हूं। तुम्हें केवल वही करना होगा जो मैं कहूं। तुम सामने रहना, और मैं तुम्हारे पीछे रहकर सारा कार्य संभाल लूंगा।”
भीमसेन को यह प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा। वह तुरंत तैयार हो गया।
बौने ने उसे सलाह दी कि वह राजा के दरबार में जाकर सेना में ऊंचे पद की मांग करे। अगले ही दिन भीमसेन राजदरबार पहुंचा।
राजा ने जब उसकी विशाल काया और बलिष्ठ शरीर देखा, तो बिना अधिक परीक्षा लिए ही उसे सेना में एक बड़े सरदार का पद दे दिया।
इसके बाद जब भी राजा कोई कठिन कार्य या युद्ध संबंधी जिम्मेदारी भीमसेन को सौंपता, बौना उसके अनुचर के रूप में पीछे खड़ा रहता और अपनी बुद्धि तथा युद्धकला से सारा काम सफलतापूर्वक पूरा कर देता।
यदि किसी डाकू दल को हराना होता, तो योजना बौना बनाता। यदि किसी युद्ध में विजय पानी होती, तो असली पराक्रम बौना दिखाता। लेकिन यश और सम्मान हमेशा भीमसेन को मिलता।
राजा और राज्य के लोग यही समझते रहे कि भीमसेन एक महान योद्धा है। धीरे-धीरे उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। उसे धन, सम्मान और वैभव मिलने लगा। लेकिन सफलता के साथ उसका अहंकार भी बढ़ने लगा।
कुछ ही समय में भीमसेन पहले से भी अधिक मोटा और घमंडी हो गया। अब वह बौने को अपना मित्र नहीं समझता था। वह उसके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करने लगा। कभी उसे डांटता, कभी अपमानित करता और कभी उसके योगदान को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता।
बौना यह सब चुपचाप सहता रहा, लेकिन उसके मन में पीड़ा और अपमान की आग जलने लगी। उसने मन-ही-मन निश्चय किया कि एक दिन वह भीमसेन को उसकी कृतघ्नता का फल अवश्य चखाएगा। संयोग से कुछ समय बाद पड़ोसी राज्य के राजा ने आक्रमण कर दिया। शत्रु सेना विशाल और शक्तिशाली थी। राज्य में भय का वातावरण फैल गया। राजा ने तुरंत भीमसेन को सेना का नेतृत्व सौंपा। सबको विश्वास था कि वही राज्य को बचाएगा। भीमसेन एक विशाल हाथी पर सवार होकर युद्धभूमि की ओर चला। उसके पीछे बौना भी बैठा था।
लेकिन जैसे ही युद्धभूमि में उसने शत्रु सेना को सामने देखा, उसके होश उड़ गए। हजारों सैनिकों, घोड़ों और हाथियों को देखकर उसका साहस टूट गया। उसका शरीर कांपने लगा।
भय से वह हाथी के ऊपर से नीचे गिर पड़ा और घबराहट में हाथी की लीद में लोटने लगा। उसकी सारी वीरता और घमंड पलभर में समाप्त हो गया।
उधर शत्रु सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी। यदि तुरंत कुछ न किया जाता, तो राज्य की हार निश्चित थी।
तभी बौना आगे आया। वह सच्चा देशभक्त और वीर योद्धा था। उसने तुरंत सेना की कमान अपने हाथ में ले ली। उसने ऊंची गर्जना की और सैनिकों का उत्साह बढ़ाया।
फिर वह अपने अद्भुत युद्ध कौशल के साथ शत्रु सेना पर टूट पड़ा।
उसकी रणनीति इतनी चतुर और उसका साहस इतना प्रबल था कि शत्रु सेना घबरा गई। बौने के नेतृत्व में राज्य की सेना ने भीषण युद्ध किया और अंततः शत्रु पर विजय प्राप्त की।
शत्रु सैनिक रणभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए।
जब राजा को सच्चाई का पता चला कि वास्तविक वीर तो बौना था और भीमसेन केवल दिखावे का सेनानी था, तब वह अत्यंत आश्चर्यचकित हुआ।
राजा ने तुरंत बौने को सम्मान सहित राज्य का नया सेनापति नियुक्त कर दिया। उसे धन, मान और प्रतिष्ठा प्रदान की गई।
जहां तक भीमसेन का प्रश्न था, वह शर्म और भय से सिर झुकाए खड़ा था।
लेकिन बौना उदार हृदय वाला था। उसने बदला लेने के बजाय उसे पर्याप्त धन दिया और प्रेमपूर्वक समझाया कि वह फिर से अपना पुराना जुलाहे का कार्य ही करे, क्योंकि वही उसके लिए उचित है।
इस प्रकार बौने ने अपनी बुद्धि, वीरता और धैर्य से न केवल राज्य की रक्षा की, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि मनुष्य की महानता उसके शरीर के आकार में नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा, साहस और चरित्र में होती है।
ढोल बजाने वाला : जातक कथा
बहुत समय पहले वाराणसी के पास एक छोटे से गांव में एक गरीब ढोल बजाने वाला अपनी पत्नी और छोटे बेटे के साथ रहता था। उसका जीवन अत्यंत साधारण था। वह गांव-गांव जाकर उत्सवों, विवाहों और मेलों में ढोल बजाकर जो थोड़े-बहुत पैसे कमाता, उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था।
हालांकि वह निर्धन था, लेकिन अपने काम में अत्यंत निपुण था। जब वह ढोल बजाता, तो उसकी थाप सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते। उसके हाथों में ऐसी कला थी कि साधारण-सा ढोल भी मधुर संगीत की तरह सुनाई देता था।
एक दिन समाचार फैला कि वाराणसी नगर में बहुत बड़ा मेला लगने वाला है। दूर-दूर से व्यापारी, कलाकार और तमाशा दिखाने वाले वहां आने वाले थे। गांव के लोग भी उसी की चर्चा कर रहे थे।
जब ढोल बजाने वाले की पत्नी ने यह बात सुनी, तो वह तुरंत अपने पति के पास आई। उसके चेहरे पर आशा की चमक थी।
उसने कहा, “सुनते हो, वाराणसी में बहुत बड़ा मेला लगा है। वहां हजारों लोग आएंगे। यदि तुम वहां जाकर ढोल बजाओगे, तो अवश्य ही अच्छी कमाई होगी। शायद हमारी गरीबी कुछ कम हो जाए।”
पत्नी की बात सुनकर ढोल बजाने वाला सोच में पड़ गया। फिर उसे भी लगा कि यह अवसर अच्छा है। यदि भाग्य ने साथ दिया, तो कई दिनों की कमाई एक ही दिन में हो सकती है।
अगली सुबह वह अपना ढोल लेकर अपने छोटे बेटे के साथ वाराणसी की ओर चल पड़ा।
जब वे मेले में पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर दोनों की आंखें चमक उठीं। चारों ओर रंग-बिरंगी दुकानें सजी थीं। कहीं मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी, तो कहीं नाच-गाने और खेल-तमाशों की आवाजें गूंज रही थीं।
ढोल बजाने वाले ने भीड़ के बीच एक उचित स्थान चुना और पूरे उत्साह के साथ ढोल बजाना शुरू किया।
उसकी थाप इतनी मधुर और आकर्षक थी कि देखते ही देखते लोग उसके चारों ओर इकट्ठा होने लगे। कोई उसकी कला की प्रशंसा करता, तो कोई प्रसन्न होकर उसे पैसे देता।
दिनभर वह लगातार ढोल बजाता रहा और शाम तक उसके पास अच्छी-खासी धनराशि जमा हो गई। इतने पैसे उसने शायद पहले कभी एक साथ नहीं देखे थे।
वह अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसके बेटे की खुशी का भी ठिकाना नहीं था। लौटते समय पिता ने प्यार से उसके लिए मिठाइयां, खिलौने और उसकी पसंद की कई छोटी-छोटी चीजें खरीदीं।
रात होने से पहले वे अपने गांव लौटने लगे।
लेकिन वाराणसी और उनके गांव के बीच एक घना जंगल पड़ता था, जो डाकुओं के लिए बदनाम था। वहां अक्सर राहगीरों को लूट लिया जाता था।
ढोल बजाने वाला इस बात को अच्छी तरह जानता था।
उधर उसका छोटा बेटा खुशी से झूम रहा था। वह पिता का ढोल उठाकर लगातार बजाता जा रहा था। उसकी बाल-सुलभ उमंग थमने का नाम नहीं ले रही थी।
जैसे ही वे जंगल के पास पहुंचे, पिता चिंतित हो उठा। उसने बेटे को समझाते हुए कहा, “बेटा, जंगल में धीरे-धीरे चलो और ढोल मत बजाओ। यहां डाकू रहते हैं। यदि उन्हें पता चल गया कि हम लोग पैसे लेकर जा रहे हैं, तो वे हमें लूट लेंगे।”
लेकिन बच्चा अभी भी उत्साह में था। उसने पिता की बात को गंभीरता से नहीं लिया।
तब पिता ने उसे फिर समझाया, “यदि तुम्हारा मन ढोल बजाने का बहुत है, तो लगातार मत बजाओ। थोड़ा-थोड़ा रुककर इस प्रकार बजाओ कि सुनने वालों को लगे जैसे किसी राजा या बड़े अधिकारी की सवारी जा रही हो। तब डाकू डर जाएंगे और पास आने का साहस नहीं करेंगे।”
पिता की बात में बुद्धिमानी थी। वह जानता था कि भय का प्रभाव कभी-कभी हथियारों से भी अधिक होता है।
किन्तु नासमझ बालक ने फिर भी उसकी बात नहीं मानी। वह पूरे जोर-जोर से ढोल पीटता हुआ आगे बढ़ता रहा। जंगल की निस्तब्धता में ढोल की आवाज दूर-दूर तक गूंजने लगी।
उसी जंगल में छिपे डाकुओं ने जब ढोल की आवाज सुनी, तो वे सतर्क हो गए। पहले तो उन्हें लगा कि कोई बड़ी टोली आ रही होगी। लेकिन जब उन्होंने छिपकर देखा, तो वहां केवल एक गरीब ढोल बजाने वाला और उसका छोटा बेटा दिखाई दिए।
यह देखकर डाकुओं के चेहरे पर क्रूर मुस्कान फैल गई।
वे तुरंत बाहर निकल आए और उन दोनों को घेर लिया। ढोल बजाने वाला कुछ समझ पाता, उससे पहले ही डाकुओं ने उसकी पिटाई शुरू कर दी।
उन्होंने उसके पास रखे सारे पैसे छीन लिए। यहां तक कि मेले से खरीदी गई चीजें भी लूट लीं।
बेचारा ढोल बजाने वाला असहाय होकर सब कुछ देखता रह गया। उसका बेटा भय से कांपने लगा।
कुछ ही क्षणों में डाकू सारा धन लेकर जंगल में गायब हो गए।
ढोल बजाने वाला दुखी मन से अपने बेटे को लेकर गांव की ओर चल पड़ा। उसकी आंखों में पीड़ा थी, लेकिन उससे भी अधिक दुःख इस बात का था कि यदि बेटे ने उसकी बात मान ली होती, तो उनकी सारी मेहनत और कमाई बच सकती थी।
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि अनुभव और बुद्धिमानी से दी गई सलाह को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। कई बार थोड़ी-सी असावधानी और जिद मनुष्य को बड़े नुकसान में डाल देती है।
सोने का हंस : जातक कथा
बहुत समय पहले वाराणसी नगरी में एक अत्यंत कर्त्तव्यनिष्ठ, दयालु और शीलवान गृहस्थ रहा करता था। वह अपने छोटे-से परिवार के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता था। उसकी पत्नी और तीन सुंदर बेटियाँ थीं। यद्यपि वह बहुत धनी नहीं था, फिर भी अपने परिवार के पालन-पोषण में कभी कोई कमी नहीं आने देता था।
वह सदैव ईमानदारी और परिश्रम से कमाई करता और अपने परिवार को प्रेम तथा स्नेह से भरकर रखता। उसकी पत्नी और बेटियाँ भी उससे अत्यंत प्रेम करती थीं। उनका जीवन संतोष और सादगी में बीत रहा था।
किन्तु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।
अल्प आयु में ही उस गृहस्थ का निधन हो गया। उसके चले जाने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर का सहारा छिन गया और धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। उस गृहस्थ ने अपने सत्कर्मों और पुण्य के प्रभाव से अगले जन्म में एक अद्भुत स्वर्ण हंस के रूप में जन्म लिया। उसके शरीर के पंख शुद्ध सोने की भांति चमकते थे। वह सामान्य हंसों से बिल्कुल अलग और अत्यंत सुंदर दिखाई देता था।
लेकिन उसके भीतर पूर्व जन्म की स्मृतियाँ अभी भी जीवित थीं। वह अपने पुराने जीवन, अपनी पत्नी, अपनी बेटियों और उनके प्रति अपने प्रेम को भूल नहीं पाया था। मनुष्य जीवन के संस्कार और परिवार का मोह उसके मन में गहराई से बसे हुए थे।
एक दिन अपने पुराने परिवार की याद में व्याकुल होकर वह स्वर्ण हंस उड़ता हुआ वाराणसी पहुंच गया।
जब वह अपने पुराने घर की मुंडेर पर बैठा, तो उसने देखा कि उसकी पत्नी और बेटियाँ अब बहुत निर्धन अवस्था में जीवन जी रही थीं। जहां पहले घर में सुख और समृद्धि थी, वहां अब अभाव और गरीबी का साम्राज्य था।
उसकी पत्नी और बेटियाँ फटे-पुराने वस्त्र पहनने को मजबूर थीं। घर के सुंदर सामान भी गायब हो चुके थे। उनके चेहरों पर चिंता और संघर्ष साफ दिखाई दे रहे थे।
यह सब देखकर स्वर्ण हंस का हृदय दुख से भर उठा।
वह धीरे-धीरे नीचे उतरा और अपनी पत्नी तथा बेटियों के सामने जाकर बोला, “डरो मत। मैं कोई साधारण हंस नहीं हूं। मैं वही व्यक्ति हूं जो पिछले जन्म में तुम्हारा पति और तुम्हारा पिता था।”
पहले तो वे उसकी बात सुनकर चकित रह गईं, लेकिन जब उसने पुरानी बातों और घटनाओं का उल्लेख किया, तो उन्हें विश्वास हो गया कि वास्तव में यह वही आत्मा है।
स्वर्ण हंस ने प्रेमपूर्वक उन्हें सांत्वना दी और विदा होने से पहले अपने शरीर का एक सोने का पंख उन्हें दे दिया।
उसने कहा, “इस पंख को बेचकर तुम लोग अपनी गरीबी कुछ कम कर सकती हो।”
परिवार वालों ने जब वह स्वर्ण पंख बेचा, तो उन्हें काफी धन प्राप्त हुआ। कई दिनों बाद उनके घर में सुख और भोजन आया।
उस दिन के बाद स्वर्ण हंस समय-समय पर उनसे मिलने आने लगा। हर बार वह उन्हें अपने शरीर का एक सोने का पंख देकर जाता और फिर आकाश में उड़ जाता।
धीरे-धीरे उनकी स्थिति सुधरने लगी। तीनों बेटियाँ अपने पिता के इस प्रेम और दानशीलता से अत्यंत प्रसन्न थीं। वे संतोषपूर्वक जीवन बिताने लगीं। लेकिन उनकी मां के मन में धीरे-धीरे लोभ जन्म लेने लगा।
वह सोचने लगी, “जब यह हंस हर बार केवल एक पंख देता है, तो क्यों न इसके सारे पंख एक साथ निकाल लिए जाएं? तब तो हम एक ही दिन में बहुत धनी बन जाएंगे।”
उसने अपनी बेटियों से भी यह बात कही, लेकिन बेटियों ने उसकी योजना का कड़ा विरोध किया।
उन्होंने कहा, “मां, यह बहुत गलत होगा। पिता जी प्रेम से हमारी सहायता कर रहे हैं। हमें लालच नहीं करना चाहिए।”
किन्तु लोभ मनुष्य की बुद्धि को नष्ट कर देता है। पत्नी के मन में धन पाने की इच्छा इतनी प्रबल हो चुकी थी कि उसे सही और गलत का भेद दिखाई देना बंद हो गया।
कुछ दिनों बाद जब स्वर्ण हंस फिर घर आया, तो संयोगवश उसकी बेटियाँ घर पर नहीं थीं।
पत्नी ने उस दिन बड़े प्रेम और स्नेह का दिखावा किया। उसने मधुर शब्दों में हंस को अपने पास बुलाया। सरल और निष्कपट स्वर्ण हंस उसकी चालाकी को समझ नहीं पाया।
वह खुशी-खुशी उसके पास चला गया। लेकिन जैसे ही वह निकट पहुंचा, उसकी पत्नी ने अचानक उसकी गर्दन पकड़ ली और निर्दयता से उसके सारे पंख नोच डाले। स्वर्ण हंस दर्द से तड़प उठा। उसके शरीर से रक्त बहने लगा। वह असहाय होकर पीड़ा से कराहता रहा। पत्नी जल्दी-जल्दी उन पंखों को समेटने लगी, लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ।
जो पंख अभी तक सोने के थे, वे अचानक साधारण हंस के सफेद पंख बन गए।
क्योंकि स्वर्ण हंस के पंख केवल उसकी इच्छा से दिए जाने पर ही स्वर्ण बने रहते थे। जब उन्हें लालच और हिंसा से छीना गया, तो उनका सारा मूल्य समाप्त हो गया। पत्नी स्तब्ध रह गई। उसका लोभ व्यर्थ सिद्ध हुआ।
उसने न केवल सोने के पंख खो दिए, बल्कि उस प्रेम और विश्वास को भी नष्ट कर दिया जो उसे बिना मांगे मिल रहा था।
थोड़ी देर बाद जब बेटियाँ घर लौटीं, तो उन्होंने अपने पिता को घायल अवस्था में पड़ा देखा। उनका हृदय दुख से भर उठा।
उन्होंने तुरंत उनकी सेवा करनी शुरू कर दी। प्रेम और देखभाल से कुछ ही दिनों में स्वर्ण हंस स्वस्थ होने लगा।
धीरे-धीरे उसके शरीर पर नए पंख उग आए, लेकिन अब वे साधारण हंस जैसे थे। उनमें पहले जैसी स्वर्णिम चमक नहीं थी।
जब उसके पंख इतने मजबूत हो गए कि वह उड़ सके, तब वह एक दिन चुपचाप आकाश में उड़ गया।
उसके बाद वह कभी वापस वाराणसी नहीं लौटा।
उसकी बेटियाँ जीवनभर अपने पिता के प्रेम और त्याग को याद करती रहीं, जबकि उसकी पत्नी अपने लालच पर पछताती रही।
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि लालच मनुष्य से उसका सुख, सम्मान और प्रेम सब कुछ छीन लेता है। संतोष और कृतज्ञता ही सच्चा धन हैं, जबकि लोभ अंततः विनाश का कारण बनता है।
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जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।
रचनाकार: जातक कथाएँ
प्रस्तुति: Saying Central Team