जातक कथा

जातक कथा: रुरु मृग की कथा

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जातक कथा: रुरु मृग की कथा

बहुत समय पहले घने और शांत वनों के बीच एक अद्भुत मृग निवास करता था, जिसका नाम रुरु था। वह कोई साधारण हिरण नहीं था। उसका शरीर मानो शुद्ध सोने से बना हुआ था। उसकी चमकती त्वचा पर माणिक, नीलम और पन्ने जैसी रंगीन आभा झिलमिलाती रहती थी।

उसके रेशमी बाल इतने मुलायम थे जैसे मखमल पर हाथ फिर रहा हो। उसकी आंखें नीले आकाश की तरह निर्मल और गहरी थीं, जबकि उसके सींग और खुर तराशे हुए स्फटिक की भांति चमकते थे।
जब वह वन में दौड़ता, तो ऐसा लगता मानो सुनहरी बिजली धरती पर उतर आई हो। जो भी उसे देखता, उसकी सुंदरता पर मोहित हुए बिना नहीं रह पाता।

लेकिन रुरु की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सुंदरता नहीं थी। उसकी सबसे महान विशेषता उसका दयालु और करुणामय हृदय था। वह अत्यंत विवेकशील था और मनुष्यों की भाषा भी बोल सकता था। पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण वह यह भली-भांति जानता था कि मनुष्य अक्सर लोभ और स्वार्थ के कारण उपकार का बदला भी बुराई से देता है। फिर भी उसके हृदय में सभी जीवों के प्रति असीम करुणा थी।

एक दिन रुरु वन में स्वतंत्र होकर विचरण कर रहा था। तभी उसे किसी मनुष्य की भयभीत चीख सुनाई दी। वह तुरंत उस दिशा में दौड़ा। कुछ दूर जाकर उसने देखा कि एक पहाड़ी नदी की प्रचंड धारा में एक आदमी बहता जा रहा था। वह डूबने ही वाला था और सहायता के लिए पुकार रहा था। रुरु का करुणामय हृदय तुरंत द्रवित हो उठा।

बिना एक क्षण गंवाए वह नदी में कूद पड़ा।
उसने डूबते व्यक्ति से कहा, “डरो मत। मेरे पैरों को पकड़ लो, मैं तुम्हें बाहर निकाल दूंगा।”
लेकिन भय से घबराया हुआ वह व्यक्ति रुरु के पैरों को पकड़ने के बजाय उसकी पीठ पर ही चढ़ बैठा। उसका पूरा भार नाजुक रुरु के शरीर पर आ गया।

रुरु चाहता तो उसे झटककर अलग कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने धैर्य और साहस के साथ प्रचंड धारा का सामना किया और बड़ी कठिनाई से उस व्यक्ति को सुरक्षित किनारे तक ले आया।
किनारे पर पहुंचते ही वह आदमी अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसकी जान बच चुकी थी।

उसने कृतज्ञता से भरकर रुरु को धन्यवाद देना चाहा, लेकिन रुरु ने शांत स्वर में कहा, “यदि तुम सचमुच मेरा उपकार मानते हो, तो किसी से भी यह मत कहना कि इस वन में एक स्वर्ण-मृग रहता है। यदि मनुष्यों को मेरे अस्तित्व का पता चल गया, तो वे लोभ में आकर मेरा शिकार करने लगेंगे।”

वह व्यक्ति रुरु की बात मानकर वहां से चला गया और रुरु भी अपने निवास स्थान लौट आया।
कुछ समय बाद उसी राज्य की रानी ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उसने स्वप्न में रुरु जैसे स्वर्णिम और सुंदर मृग के दर्शन किए। उसकी सुंदरता देखकर रानी मंत्रमुग्ध हो गई।

सुबह होते ही उसके मन में उस अद्भुत मृग को पाने की तीव्र इच्छा जाग उठी।
उसने राजा से कहा, “महाराज, मैंने स्वप्न में एक स्वर्ण मृग देखा है। वह इतना सुंदर था कि मैं उसे अपने पास रखना चाहती हूं। चाहे जैसे भी हो, उसे खोजकर मेरे पास लाया जाए।”

राजा अपनी रानी से अत्यंत प्रेम करता था। वह उसकी इच्छा टाल नहीं सका।
तुरंत पूरे राज्य में घोषणा करवा दी गई कि जो व्यक्ति उस स्वर्ण मृग का पता बताएगा, उसे एक पूरा गांव और दस सुंदर युवतियां पुरस्कार में दी जाएंगी।

यह घोषणा उसी व्यक्ति ने भी सुनी जिसकी जान रुरु ने बचाई थी।
लोभ ने तुरंत उसके मन को घेर लिया। वह रुरु का उपकार भूल गया और पुरस्कार पाने की लालसा में सीधे राजा के दरबार में पहुंच गया।

उसने राजा को रुरु के निवास स्थान का पूरा भेद बता दिया।
राजा तुरंत अपने सैनिकों के साथ उस वन की ओर चल पड़ा। थोड़ी ही देर में उन्होंने चारों ओर से रुरु को घेर लिया।
जब राजा ने पहली बार रुरु को देखा, तो वह उसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्तब्ध रह गया। वह बिल्कुल वैसा ही था जैसा रानी ने अपने स्वप्न में वर्णन किया था।

राजा ने अपना धनुष उठाया और तीर रुरु की ओर तान दिया।
चारों ओर से घिरा हुआ रुरु शांत भाव से राजा को देखने लगा। फिर उसने मनुष्य की भाषा में कहा, “राजन, यदि आप मुझे मारना ही चाहते हैं तो मार दीजिए, लेकिन पहले यह बताइए कि आपको मेरे निवास स्थान का पता कैसे चला?”

राजा ने अपने तीर की नोक उस व्यक्ति की ओर घुमा दी जिसे रुरु ने कभी डूबने से बचाया था।
उसे देखते ही रुरु समझ गया कि उसके साथ विश्वासघात हुआ है।
उसके मुख से तत्काल दुःख भरे शब्द निकले, “पानी से लकड़ी का कुंदा निकाल लेना, लेकिन किसी अकृतज्ञ मनुष्य को कभी मत बचाना।”

राजा ने आश्चर्य से रुरु की ओर देखा और उससे इस बात का अर्थ पूछा।
तब रुरु ने पूरी घटना सुनाई — कैसे उसने उस व्यक्ति की जान बचाई थी और कैसे उसने बदले में विश्वासघात किया।
रुरु की करुणा और त्याग की कथा सुनकर राजा का हृदय बदल गया। उसे उस व्यक्ति की कृतघ्नता पर अत्यंत क्रोध आया।
क्रोधित होकर उसने उसी क्षण उस विश्वासघाती व्यक्ति को दंड देने के लिए तीर उठाया।
लेकिन करुणामय रुरु ने तुरंत राजा को रोक दिया।

उसने कहा, “राजन, क्रोध में किसी की हत्या करना उचित नहीं है। यदि मैंने इसे जीवनदान दिया था, तो उसका उद्देश्य किसी की मृत्यु नहीं था। इसे क्षमा कर दीजिए।”
रुरु की दया, सहनशीलता और महानता देखकर राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। उसने अपना धनुष नीचे रख दिया और उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया।

इसके बाद राजा ने आदरपूर्वक रुरु को अपने राज्य में आने का निमंत्रण दिया।
रुरु ने राजा का आग्रह स्वीकार किया और कुछ दिनों तक राजमहल में अतिथि बनकर रहा। वहां राजा और रानी दोनों उसके ज्ञान, करुणा और महान विचारों से अत्यंत प्रभावित हुए।

कुछ समय बाद रुरु पुनः अपने प्रिय वन में लौट गया, जहां वह शांति और स्वतंत्रता के साथ रहने लगा।
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची महानता बाहरी सुंदरता में नहीं, बल्कि करुणा, क्षमा और उदारता में होती है। साथ ही यह भी कि लोभ और कृतघ्नता मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है, जबकि दया और क्षमा उसे महान बनाती हैं।

बुद्धिमान् वानर : जातक कथा

हज़ारों वर्ष पहले एक विशाल और घने वन में बंदरों का एक बड़ा समुदाय निवास करता था। उस समुदाय का राजा एक अत्यंत बुद्धिमान, धैर्यवान और दूरदर्शी वानर था। उसका शरीर बलवान था, किंतु उससे कहीं अधिक प्रभावशाली उसकी बुद्धि थी। उसके अधीन लगभग एक हजार बंदर रहते थे और सभी उसका अत्यंत सम्मान करते थे, क्योंकि वह केवल शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी समझदारी और न्यायप्रियता से शासन करता था। वह अपने प्रत्येक साथी की रक्षा को अपना कर्तव्य मानता था और संकट की हर घड़ी में सबसे आगे खड़ा रहता था।

एक बार ग्रीष्म ऋतु अपने प्रचंड रूप में थी। वन के अधिकांश झरने और तालाब सूख चुके थे। चारों ओर धूल उड़ती थी और तपती हुई धरती से गर्म हवाएँ निकल रही थीं। ऐसे कठिन समय में वानरराज अपने साथियों के साथ भोजन और जल की खोज में वन के एक नए भाग की ओर निकल पड़ा। बंदरों का विशाल समूह पेड़ों से छलांग लगाता, डालियों पर झूलता और इधर-उधर घूमता हुआ काफी दूर निकल आया। लेकिन दुर्भाग्यवश उस क्षेत्र में पानी का कोई स्रोत दिखाई नहीं दे रहा था।

धीरे-धीरे प्यास के कारण सभी बंदरों की अवस्था खराब होने लगी। छोटे-छोटे बच्चे व्याकुल होकर रोने लगे और मादा बंदर भी थकावट से चूर हो गईं। उनकी आँखों में चिंता और भय साफ दिखाई देने लगा। यह देखकर वानरराज का हृदय द्रवित हो उठा। उसने तुरंत अपने विश्वस्त अनुचरों को आदेश दिया कि वे चारों दिशाओं में जाकर पानी का कोई स्रोत खोजें। राजा की आज्ञा पाकर बंदरों का एक दल अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़ा।

कुछ समय बाद उनमें से कुछ बंदर दौड़ते हुए लौटे और उन्होंने उत्साहित होकर सूचना दी कि थोड़ी दूरी पर एक बड़ा जलाशय है, जिसमें पर्याप्त पानी भरा हुआ है। यह समाचार सुनते ही प्यास से तड़प रहे सारे बंदर प्रसन्न हो उठे। वे तुरंत उस जलाशय की ओर दौड़ पड़े। छोटे बंदर तो खुशी से उछलने लगे, क्योंकि उन्हें लगा कि अब उनकी प्यास बुझ जाएगी।

किन्तु जैसे ही वे जलाशय के निकट पहुँचे और पानी में उतरने लगे, तभी बुद्धिमान वानरराज ने उन्हें रोक दिया। उसने गंभीर स्वर में कहा कि किसी अनजान स्थान पर बिना सोचे-समझे प्रवेश करना उचित नहीं होता। वह जानता था कि जंगल में हर सुंदर दिखाई देने वाली वस्तु सुरक्षित नहीं होती। इसलिए उसने पहले उस जलाशय का निरीक्षण करने का निश्चय किया।

वानरराज अपने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ जलाशय के चारों ओर घूमने लगा। वह बहुत ध्यान से भूमि और पानी के किनारों को देखने लगा। निरीक्षण करते-करते उसकी दृष्टि कुछ विचित्र पदचिह्नों पर पड़ी। उसने देखा कि कई जानवरों के पैरों के निशान जलाशय की ओर तो जा रहे थे, लेकिन कोई भी निशान वापस लौटता दिखाई नहीं दे रहा था। यह देखकर उसकी बुद्धि तुरंत सचेत हो गई। उसने मन ही मन विचार किया कि अवश्य ही इस जलाशय में कोई भयंकर दैत्य या राक्षसी जीव रहता है, जो पानी पीने आने वाले प्राणियों को मारकर खा जाता है।

उसने तुरंत अपने साथियों को सावधान किया और कहा कि यदि वे सीधे पानी में उतरे, तो निश्चित रूप से मृत्यु के मुख में चले जाएँगे। यह सुनकर सारे बंदर भयभीत हो गए। उनकी प्यास बढ़ती जा रही थी, लेकिन पानी सामने होते हुए भी वे उसे पी नहीं सकते थे। छोटे बंदरों की आँखों में आँसू आ गए और सभी निराश होकर अपने राजा की ओर देखने लगे।

तब बुद्धिमान वानर ने शांत स्वर में कहा कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, बुद्धि और धैर्य से उसका समाधान निकाला जा सकता है। उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि जलाशय के किनारे घने बेंत के पेड़ उगे हुए हैं। उसके मन में तुरंत एक युक्ति आई। उसने अपने साथियों को आदेश दिया कि वे उन बेंतों को तोड़कर लंबी नलियों की तरह प्रयोग करें। फिर सभी बंदर जलाशय से सुरक्षित दूरी बनाकर उन बेंतों की खोखली नलियों से पानी चूसकर पीने लगे।

इस प्रकार बिना जलाशय में उतरे ही उनकी प्यास बुझ गई। जलाशय के भीतर रहने वाला भयंकर दैत्य यह सब देखता रहा। वह चाहता था कि बंदर पानी में उतरें ताकि वह उन्हें पकड़कर खा सके, लेकिन बुद्धिमान वानर की चतुराई के कारण उसकी सारी योजना विफल हो गई। उसकी शक्ति केवल जलाशय के भीतर तक सीमित थी, इसलिए वह बाहर खड़े बंदरों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सका।

जब सभी बंदरों की प्यास शांत हो गई, तब वानरराज ने उन्हें तुरंत वहाँ से लौट चलने का आदेश दिया। सारे बंदर अपने बुद्धिमान राजा की प्रशंसा करते हुए खुशी-खुशी वापस अपने वन की ओर लौट गए। वे समझ चुके थे कि केवल बल ही नहीं, बल्कि बुद्धि और सावधानी भी जीवन की सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं।

उस दिन के बाद से सभी बंदरों के मन में अपने राजा के प्रति सम्मान और भी अधिक बढ़ गया। वे यह भली-भांति जान गए कि संकट के समय धैर्य और विवेक से लिया गया निर्णय ही जीवन की रक्षा करता है। यही कारण था कि उनका राजा केवल एक शक्तिशाली वानर नहीं, बल्कि सच्चा बुद्धिमान नेता कहलाता था।

महाकपि का बलिदान : जातक कथा

हजारों वर्ष पहले हिमालय की ऊँची पर्वतमालाओं के बीच एक अत्यंत रमणीय वन था। उस वन के बीचों-बीच एक निर्मल नदी बहती थी, जिसका जल क्रिस्टल की तरह स्वच्छ और शीतल था। नदी के किनारे अनेक प्रकार के वृक्ष और लताएँ लहलहाती थीं। उन्हीं वृक्षों के बीच एक अद्भुत और दुर्लभ वृक्ष भी खड़ा था, जिसकी विशेषता पूरे वन में प्रसिद्ध थी। वह कोई साधारण वृक्ष नहीं था।

उसके फल आकार में बड़े, सुगंध में मनमोहक और स्वाद में इतने मधुर थे कि उन्हें खाने वाला उनके स्वाद को कभी भूल नहीं पाता था। कहा जाता था कि उसके फल चेरी से अधिक रसीले, आम से अधिक मीठे और किसी दिव्य पुष्प की तरह सुगंधित थे। जब वे पकते, तो उनकी महक दूर-दूर तक फैल जाती थी।

उस दुर्लभ वृक्ष पर बंदरों का एक विशाल झुंड निवास करता था। वे उसी वृक्ष के फलों को खाकर अपना जीवन बिताते और आनंदपूर्वक रहते थे। उन बंदरों का एक राजा भी था, जो अन्य सभी वानरों से कहीं अधिक बलवान, बुद्धिमान और दूरदर्शी था। उसका शरीर विशाल था, उसकी आँखों में तेज झलकता था और उसका स्वभाव अत्यंत दयालु था। वह अपने साथियों की रक्षा को अपना सबसे बड़ा धर्म मानता था। सभी बंदर उसे आदरपूर्वक “महाकपि” कहकर पुकारते थे।

महाकपि केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि अत्यंत सावधान और दूर की सोच रखने वाला भी था। उसने अपने सभी साथियों को एक महत्वपूर्ण आदेश दे रखा था। उसने कहा था कि वृक्ष की कोई भी फलयुक्त डाली नदी के ऊपर न रहने दी जाए और यदि कोई फल नदी की दिशा में हो, तो उसे तुरंत तोड़ लिया जाए। उसका विचार था कि यदि कोई फल नदी में गिरकर बहता हुआ मनुष्यों तक पहुँच गया, तो वे इस वृक्ष की खोज करते हुए यहाँ अवश्य आएँगे और तब बंदरों के जीवन पर संकट आ जाएगा।

सभी बंदर अपने राजा की बुद्धिमानी को जानते थे, इसलिए वे उसके आदेशों का पूरी निष्ठा से पालन करते थे। लंबे समय तक सब कुछ ठीक चलता रहा। लेकिन एक दिन दुर्भाग्यवश वृक्ष की घनी पत्तियों के बीच छिपा एक फल किसी की दृष्टि में नहीं आया। वह धीरे-धीरे पक गया और एक तेज हवा के झोंके से टूटकर सीधे नदी में जा गिरा। नदी की धारा उसे बहाकर दूर ले गई।

उसी समय उस प्रदेश का राजा अपनी रानियों, दास-दासियों और सैनिकों के साथ नदी के किनारे विहार कर रहा था। अचानक नदी के जल में बहता हुआ वह अद्भुत फल उनके समीप आकर रुक गया। जैसे ही उसकी सुगंध वातावरण में फैली, राजा और उसकी रानियाँ मंत्रमुग्ध हो उठीं। वह सुगंध इतनी मधुर थी कि सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए। राजा ने तुरंत अपने सेवकों को उस फल को लाने का आदेश दिया।

जब फल राजा के सामने लाया गया, तो पहले उसका परीक्षण कराया गया कि कहीं वह विषैला तो नहीं। परीक्षण के बाद जब यह ज्ञात हुआ कि फल सुरक्षित है, तब राजा ने स्वयं उसका स्वाद चखा। जैसे ही रस उसकी जीभ पर पड़ा, वह आनंद से भर उठा। ऐसा स्वाद उसने जीवन में कभी नहीं चखा था। उसी क्षण उसके मन में उस वृक्ष को पाने की तीव्र इच्छा जाग उठी। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उस फल के स्रोत का पता लगाएँ।

राजा के सैनिक नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़े और अंततः उस अद्भुत वृक्ष तक पहुँच गए। लेकिन वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष पर सैकड़ों बंदर निवास कर रहे हैं और आनंदपूर्वक फलों का सेवन कर रहे हैं। सैनिकों को यह बात पसंद नहीं आई। उन्होंने सोचा कि यदि इन बंदरों को हटाया न गया, तो राजा कभी इस वृक्ष का आनंद नहीं ले सकेगा। इसलिए उन्होंने तुरंत अपने धनुष उठाए और बंदरों पर तीर चलाने शुरू कर दिए।

अचानक हुए इस आक्रमण से सारे बंदर भयभीत हो उठे। चारों ओर चीख-पुकार मच गई। छोटे बंदर अपनी माताओं से लिपट गए और सब इधर-उधर भागने लगे। लेकिन उस संकट की घड़ी में भी महाकपि ने धैर्य नहीं खोया। उसने तुरंत अपने साथियों की रक्षा का उपाय सोचा।

वृक्ष के पास ही नदी के दूसरी ओर एक ऊँची पहाड़ी थी, जहाँ घना बेंत का वन फैला हुआ था। महाकपि ने एक लंबी छलांग लगाई और अपने पैरों से बेंत की मजबूत लकड़ी को पकड़ लिया। फिर उसने अपने दोनों हाथ वृक्ष की शाखा पर जमा दिए और स्वयं को पुल की तरह फैला दिया। उसका विशाल शरीर अब वृक्ष और पहाड़ी के बीच एक जीवित सेतु बन चुका था।

फिर उसने ऊँचे स्वर में अपने साथियों को आदेश दिया कि वे उसके शरीर पर चढ़कर दूसरी ओर सुरक्षित स्थान पर चले जाएँ। सारे बंदर अपने राजा की पीठ और शरीर पर दौड़ते हुए एक-एक कर पहाड़ी की ओर कूदने लगे। महाकपि दर्द से कराह रहा था, लेकिन उसने अपने शरीर को तनिक भी ढीला नहीं पड़ने दिया। वह जानता था कि यदि वह कमजोर पड़ा, तो उसके साथी नदी में गिरकर मर जाएँगे।

एक-एक करके सभी बंदर सुरक्षित दूसरी ओर पहुँच गए। किंतु इतने भारी झुंड के पैरों से कुचले जाने के कारण महाकपि का शरीर बुरी तरह घायल हो चुका था। उसकी हड्डियाँ टूट गई थीं और शरीर से रक्त बह रहा था। फिर भी उसके चेहरे पर संतोष था, क्योंकि उसने अपने साथियों का जीवन बचा लिया था।

राजा यह अद्भुत दृश्य देख रहा था। उसने पहले कभी ऐसा त्याग और ऐसी निःस्वार्थ भावना नहीं देखी थी। वह महाकपि की महानता से अत्यंत प्रभावित हुआ। उसे अपनी क्रूरता पर पश्चाताप होने लगा। उसने तुरंत अपने सैनिकों को आदेश दिया कि उस महान वानर को जीवित और सम्मानपूर्वक नीचे उतारा जाए।

राजा ने महाकपि के उपचार के लिए वैद्यों को बुलवाया। उसकी सेवा की गई, औषधियाँ दी गईं, लेकिन अत्यधिक पीड़ा और घावों के कारण महाकपि का शरीर अब साथ छोड़ चुका था। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी, मानो उसे इस बात का संतोष हो कि उसने अपने प्राण देकर भी अपने साथियों को बचा लिया।

महाकपि की मृत्यु ने राजा के हृदय को पूरी तरह बदल दिया। उसने समझ लिया कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने साथियों की रक्षा के लिए जीता और आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण भी न्यौछावर कर देता है। उस दिन से राजा ने वन के सभी जीवों की रक्षा करने का संकल्प लिया और महाकपि का बलिदान युगों-युगों तक स्मरण किया जाने लगा।

संत भैंसा और नटखट बंदर : जातक कथा

बहुत समय पहले हिमवंत के विशाल और घने वनों में एक जंगली भैंसा रहता था। उसका शरीर अत्यंत विशाल था। वह काले रंग का, कीचड़ से सना और देखने में बड़ा भयानक प्रतीत होता था। उसके शरीर से मिट्टी और दलदल की गंध आती थी, इसलिए वन के कई छोटे जीव उससे दूर ही रहते थे। किंतु उसके बाहरी रूप के विपरीत उसका स्वभाव अत्यंत शांत, सहनशील और दयालु था। वह किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाता था और सदा अपने काम से काम रखता था। जंगल के अन्य प्राणी उसकी सज्जनता और धैर्य का सम्मान करते थे।

उसी वन में एक बंदर भी रहता था। वह अत्यंत चंचल और शरारती स्वभाव का था। उसे दिनभर उछलना-कूदना, दूसरों को चिढ़ाना और परेशान करना बहुत अच्छा लगता था। किसी को चैन से बैठा देखना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था। वह अपनी शरारतों से दूसरे प्राणियों को परेशान करके आनंद प्राप्त करता था। धीरे-धीरे उसकी सबसे पसंदीदा शरारत उस शांत भैंसे को तंग करना बन गई।

जब भी भैंसा किसी पेड़ की छाया में विश्राम करता, बंदर चुपके से आकर उसकी पीठ पर कूद पड़ता। कभी वह उसके सींग पकड़कर झूलने लगता, तो कभी उसकी पूँछ खींचकर भाग जाता। कई बार वह भैंसे की पीठ पर बैठकर ऐसे अभिनय करता मानो कोई राजा अपने हाथी पर सवार हो। कभी वह हाथ में लकड़ी लेकर भैंसे की पीठ पर बैठ जाता और जोर-जोर से चिल्लाकर उसे इधर-उधर दौड़ाने का नाटक करता। वह स्वयं को यमराज समझता और भैंसे को अपनी सवारी। उसकी हरकतों से आसपास के दूसरे जानवर भी कभी-कभी हँस पड़ते।

भैंसा यह सब चुपचाप सहन करता रहता। वह न तो क्रोधित होता और न ही बंदर को चोट पहुँचाने का प्रयास करता। उसके मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं था। वह सोचता कि क्रोध करने से शांति भंग होती है और हिंसा से केवल दुःख ही जन्म लेता है।
उसी वन में एक पुराने वृक्ष पर एक यक्ष भी निवास करता था। वह प्रतिदिन बंदर की धृष्टता और भैंसे की सहनशीलता को देखता रहता था। यक्ष को बंदर की शरारतें बिल्कुल पसंद नहीं थीं। कई बार उसका मन करता कि वह स्वयं उस बंदर को दंड दे, किंतु वह यह देखना चाहता था कि आखिर भैंसा कब तक यह सब सहन करेगा।

एक दिन यक्ष ने भैंसे से कहा, “हे बलवान भैंसे! तुम इतने शक्तिशाली हो। यदि चाहो तो एक ही क्षण में इस उद्दंड बंदर को सबक सिखा सकते हो। फिर तुम उसकी बदतमीज़ियाँ क्यों सहते हो? वह प्रतिदिन तुम्हारा अपमान करता है और तुम चुप रहते हो।”
भैंसे ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हे यक्ष! किसी को कष्ट पहुँचाना शील और धर्म के विरुद्ध है। यदि कोई अज्ञानी अपने कर्मों से बुराई करता है, तो उसका फल उसे अवश्य मिलेगा। मुझे उसके कारण अपने मन में क्रोध और हिंसा नहीं भरनी चाहिए। मैं क्यों अपने अच्छे स्वभाव को छोड़ दूँ? संसार में हर प्राणी अपने कर्मों का फल अवश्य पाता है।”

यक्ष भैंसे की यह बात सुनकर चुप हो गया, किंतु वह मन ही मन सोचने लगा कि एक दिन अवश्य ऐसा आएगा जब बंदर को अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ेगा। कुछ समय बाद एक दिन भैंसा भोजन की खोज में वन के दूसरे भाग की ओर चला गया। वह काफी दूर निकल गया और देर तक वापस नहीं लौटा। उसी दिन संयोग से एक दूसरा जंगली भैंसा उस स्थान पर आ पहुँचा जहाँ पहला भैंसा चरता था। यह दूसरा भैंसा अत्यंत क्रोधी और उग्र स्वभाव का था। उसे किसी की शरारत या छेड़छाड़ बिल्कुल पसंद नहीं थी।

उधर नटखट बंदर अपनी आदत के अनुसार उछलता-कूदता वहाँ पहुँचा। उसने दूर से भैंसे को देखा और बिना ध्यान दिए कि यह कोई दूसरा भैंसा है, वह उसी प्रकार उसकी ओर दौड़ पड़ा। पहले की तरह उसने छलांग लगाई और सीधे भैंसे की पीठ पर चढ़ बैठा। फिर वह उसके सींग पकड़कर झूलने लगा और जोर-जोर से चिल्लाकर हँसने लगा। लेकिन इस बार परिणाम वैसा नहीं था जैसा वह हमेशा सोचता था।

क्रोधी भैंसे ने जैसे ही बंदर की हरकत महसूस की, उसकी आँखें लाल हो उठीं। उसने एक जोरदार झटका दिया जिससे बंदर जमीन पर गिर पड़ा। इससे पहले कि बंदर संभल पाता, भैंसे ने अपने नुकीले सींग उसकी छाती में घुसेड़ दिए। फिर उसने अपने भारी पैरों से उसे कुचल डाला। बंदर दर्द से चीख भी न सका और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण निकल गए।

वृक्ष पर बैठा यक्ष यह सब देख रहा था। उसे तुरंत शांत और सहनशील भैंसे की बातें याद आ गईं। उसने समझ लिया कि संसार में कोई भी अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता। जो दूसरों को कष्ट देता है, अंततः उसे भी उसी प्रकार का दुःख सहना पड़ता है।
इस प्रकार नटखट बंदर को अपनी शरारतों और उद्दंडता का परिणाम भुगतना पड़ा, जबकि शांत और धैर्यवान भैंसे की सहनशीलता और सदाचार की महिमा पूरे वन में फैल गई। यह कथा हमें सिखाती है कि धैर्य और शील महान गुण हैं, और बुरे कर्मों का फल कभी न कभी अवश्य मिलता है।

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जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।

रचनाकार: जातक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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