क्षितिज के पार उड़ती पतंग part-1
कमरे की उस पुरानी खिड़की से बाहर ताकते हुए हमेशा यही लगता था कि बाहर की दुनिया बस वैसी ही है जैसी किताबों में लिखी होती है—सीधी, सुलझी हुई और एक तय ढर्रे पर चलने वाली। बचपन की देहरी लांघकर जब कोई अठारहवें साल में कदम रखता है, तो उसे लगता है कि अब वह पूरी दुनिया को मुट्ठी में करने के लिए तैयार है, लेकिन असलियत तो यह है कि उस वक्त हम जीवन के सबसे बड़े बवंडर के मुहाने पर खड़े होते हैं।
मेज पर बिखरी हुई इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की किताबें और मां के हाथ की चाय का कप, दोनों मिलकर एक अजीब सा दबाव बना रहे थे जो छाती पर किसी भारी पत्थर की तरह महसूस होता था। उस छोटे से कस्बे से निकलकर किसी बड़े महानगर में जाने का सपना जितना सुहाना था, अपनों की उम्मीदों का बोझ उठाना उतना ही भारी लग रहा था।
“अगर इस बार भी नहीं हुआ, तो पापा का चेहरा कैसे देखूंगा?” यह सवाल हर रात सिरहाने आकर बैठ जाता था और नींद को कोसों दूर भगा देता था। मानव ने अपने कांपते हाथों से चश्मा ठीक किया और सामने लगे कैलेंडर की तारीखों को देखा जो किसी आदमखोर की तरह उसकी तरफ बढ़ रही थीं।
पिछले साल की असफलता का घाव अभी पूरी तरह भरा भी नहीं था कि समाज और रिश्तेदारों के ताने एक बार फिर से तीर की तरह चुभने के लिए तैयार खड़े थे। मां अक्सर कमरे में आकर बिना कुछ कहे बस सिर पर हाथ रख देती थीं, और उनका वह मूक समर्थन शब्दों से कहीं ज्यादा भारी और डराने वाला होता था क्योंकि उसमें खोने का डर साफ झलकता था।
इंजीनियरिंग कॉलेज का पहला दिन वैसा बिल्कुल नहीं था जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है, बल्कि वहां एक अजीब सी बेगानगी और कंक्रीट के जंगलों की ठंडी हवा थी। दिल्ली की उस भीड़भाड़ वाली बस में सफर करते हुए मानव को पहली बार अहसास हुआ कि वह अपने घर के सुरक्षित घेरे से बहुत दूर आ चुका है, जहां उसकी पहचान सिर्फ एक रोल नंबर बनकर रह गई थी।
क्लास के बाकी लड़के-लड़कियां जहां महंगे ब्रांड्स और अपनी अंग्रेजी के रौब में खोए थे, वहीं वह अपनी पुरानी चप्पलों और सहमे हुए लहजे को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। उसी शाम हॉस्टल के कमरे की बालकनी से डूबते हुए सूरज को देखते हुए उसने महसूस किया कि अकेलापन किसे कहते हैं।
“अरे भाई, तुम तो बिल्कुल किताबों में ही समा जाओगे, कभी बाहर की दुनिया भी देख लिया करो,” यह आवाज कबीर की थी, जो हॉस्टल में उसका रूममेट बनकर आया था और स्वभाव में मानव से बिल्कुल उलट था। कबीर अमीर घर का था, लापरवाह दिखता था, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी गहराई थी जो किसी को भी अपनी तरफ खींच लेती थी।
दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे पनपने लगी और मानव ने सीखा कि जिंदगी सिर्फ नंबरों का खेल नहीं है, बल्कि इसमें कुछ पल खुलकर हंसने के भी होते हैं। कबीर उसे अक्सर शहर के उन कोनों में ले जाता था जहां गिटार की धुन पर युवा अपने सपनों और अपनी नाकामियों को भूलकर बस जी रहे होते थे।
इसी बीच जिंदगी में तान्या का आना एक ऐसी ताजी हवा के झोंके की तरह था जिसने मानव के सीधे-सादे जीवन के सारे पन्ने बिखेर कर रख दिए। तान्या उसी के बैच में आर्किटेक्चर की पढ़ाई कर रही थी और उसकी हर बात में एक अनोखी तार्किकता और जिंदगी को जीने का एक अलग नजरिया साफ झलकता था। लाइब्रेरी के एक कोने में नोट्स बदलते-बदलते कब दोनों के बीच घंटों लंबी बातें होने लगीं, इसका पता ही नहीं चला, और मानव को लगने लगा कि शायद यही वह रिश्ता है जो उसे पूरा करता है। तान्या ने उसे सिखाया कि कला और जज्बात भी उतने ही जरूरी हैं जितना कि गणित के मुश्किल समीकरण।
पहले साल का रिजल्ट आया तो मानव के पैर जमीन पर नहीं टिक रहे थे क्योंकि उसने पूरे डिपार्टमेंट में टॉप किया था, और पापा का फोन पर रो देना उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन सफलता का यह नशा ज्यादा दिन नहीं टिका क्योंकि असल जिंदगी की परीक्षाएं क्लासरूम के बाहर इंतजार कर रही थीं।
कबीर धीरे-धीरे एक अजीब से अवसाद में डूबने लगा था क्योंकि उसके माता-पिता का तलाक होने जा रहा था, और उसका वह हंसता हुआ चेहरा बस एक मुखौटा साबित हो रहा था। एक रात जब कबीर ने रोते हुए मानव को गले लगाया, तब मानव को समझ आया कि पैसों से भरी जेबें भी दिल के खालीपन को कभी नहीं भर सकतीं।
क्षितिज के पार उड़ती पतंग part- 2

कॉलेज का तीसरा साल आते-आते हवाएं बदलने लगी थीं और अब भविष्य की चिंता हर चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती थी, जहां दोस्ती पर प्रतिस्पर्धा हावी होने लगी थी। मानव और तान्या के बीच भी अब वह पहले जैसी सहजता नहीं रही थी क्योंकि तान्या को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना था और मानव पर घर की आर्थिक स्थिति सुधारने की जिम्मेदारी थी।
“क्या हम सिर्फ यहीं तक थे, मानव?” तान्या का यह सवाल कैफे की उस टेबल पर तैर रहा था जहां रखी कॉफी कब की ठंडी हो चुकी थी और दोनों के पास कहने को कुछ नहीं था। उस दिन मानव ने जाना कि कभी-कभी किसी से बेइंतहा प्यार करने का मतलब उसे अपने पास रोकना नहीं, बल्कि उसे आजाद कर देना होता है।
एक बदनसीब शाम हॉस्टल के कमरे में एक ऐसा फोन आया जिसने मानव की पूरी दुनिया को एक पल में उजाड़ कर रख दिया, जब पापा के अचानक दिल के दौरे से गुजर जाने की खबर मिली। वह रात उसने बिना पलक झपकाए ट्रेन के फर्श पर बैठकर काटी, जहां हर गुजरता हुआ स्टेशन उसकी मासूमियत और उसके लड़कपन को पीछे छोड़ता जा रहा था।
जब उसने अपने हाथों से पिता की चिता को मुखाग्नि दी, तब उसे महसूस हुआ कि उसके कंधों पर अब सिर्फ उसका अपना भविष्य नहीं, बल्कि मां की बूढ़ी आंखें और घर की ढहती हुई दीवारें भी टिकी हुई हैं। वह लड़का जो कल तक छोटी-सी असफलता पर रो देता था, आज बिना एक आंसू बहाए सबको संभाल रहा था।
घर के हालात संभालने के बाद जब वह कॉलेज वापस लौटा, तो उसकी आंखों की वह पुरानी चमक गायब थी और उसकी जगह एक गंभीर, शांत और परिपक्व इंसान ने ले ली थी। कबीर ने उसे सहारा देने की कोशिश की, लेकिन अब मानव समझ चुका था कि अपनी लड़ाई उसे खुद ही लड़नी होगी, चाहे रास्ता कितना भी पथरीला क्यों न हो।
प्लेसमेंट सीजन शुरू हो चुका था और हर बड़ी कंपनी के इंटरव्यू में बैठते हुए वह अपनी तकनीकी योग्यता के साथ-साथ अपने जीवन के उस दर्द को भी छुपाए रखता था जो उसे अंदर ही अंदर निखार रहा था। कई कंपनियों ने उसे खारिज किया, लेकिन अब उसे फेलियर से डर नहीं लगता था क्योंकि उसने इससे भी बदतर देख लिया था।
आखिरकार एक मशहूर ग्लोबल फर्म ने उसे एक बहुत बड़े पैकेज के साथ सिलेक्ट कर लिया, और जब उसने यह खबर मां को फोन पर सुनाई, तो दोनों तरफ सिर्फ सिसकियां थीं, पर इस बार वे आंसू खुशी के थे। कॉलेज के आखिरी दिन जब दीक्षांत समारोह में उसे गोल्ड मेडल मिल रहा था, तब उसकी नजरें भीड़ में कबीर को ढूंढ रही थीं जो अपनी खुद की स्टार्टअप कंपनी शुरू कर चुका था।
तान्या भी वहां थी, जो अगले ही हफ्ते अमेरिका के लिए उड़ान भरने वाली थी, और दोनों ने बिना किसी शिकायत के एक-दूसरे को गले लगाया और मुस्कुराकर अलविदा कहा। वह विदाई दर्दनाक तो थी, लेकिन उसमें एक ठहराव था जो सिर्फ मैच्योरिटी से ही आ सकता है।
समारोह खत्म होने के बाद मानव उसी पुरानी खिड़की के पास जाकर खड़ा हुआ जहां से उसने कभी इस बड़े शहर का सपना देखा था, पर आज वह खुद को बदला हुआ पा रहा था। वह समझ गया था कि एडल्टहुड कोई ऐसी मंजिल नहीं है जहां पहुंचकर सब कुछ ठीक हो जाता है, बल्कि यह तो हर रोज खुद को समेटने और आगे बढ़ने की एक निरंतर प्रक्रिया है।
उसकी जेब में उसका पहला जॉइनिंग लेटर था और आंखों में आने वाले कल का धुंधला लेकिन बेहद खूबसूरत सा मंजर साफ दिखाई दे रहा था। उसने आसमान की तरफ देखा जहां एक पतंग तेज हवाओं के थपेड़े खाकर भी अपनी डोर के सहारे मजबूती से बहुत ऊंची उड़ान भर रही थी।
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प्रस्तुति: Saying Central Team