रहस्यमयी नीली डायरी part-1
नीलगिरि की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसा ओटी शहर आमतौर पर पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार रहता था, लेकिन उस सर्द रात वहां एक ऐसी खौफनाक वारदात हुई जिसने पूरे पुलिस महकमे को हिलाकर रख दिया। शहर के सबसे आलीशान और पुराने बंगले ‘हिल व्यू एस्टेट’ के बंद कमरे में वहां के मशहूर चाय बागान मालिक, राघवन चेट्टीयार की लाश मिली थी। कमरे के सभी दरवाजे और खिड़कियां भीतर से पूरी तरह लॉक थीं, जिससे यह मामला पहली ही नजर में एक नामुमकिन मर्डर यानी ‘क्लोज्ड-रूम मिस्ट्री’ लग रहा था।
स्थानीय पुलिस ने बिना वक्त गंवाए राज्य के सबसे काबिल और तेजतर्रार खोजी अफसर, इंस्पेक्टर कार्तिकेयन को इस उलझे हुए केस की कमान सौंप दी। कार्तिकेयन अपनी पैनी नजर और मुस्तैदी के लिए जाने जाते थे, जो क्राइम सीन पर मौजूद उन बारीकियों को भी पकड़ लेते थे जिन्हें आम लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जब वे अपने सहायक पुलिसकर्मी सेल्वम के साथ राघवन चेट्टीयार के उस आलीशान स्टडी रूम में दाखिल हुए, तो चारों तरफ एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी।
राघवन चेट्टीयार अपनी नक्काशीदार महोगनी की कुर्सी पर इस तरह बैठे थे जैसे मानो वे गहरी नींद में सो रहे हों, लेकिन उनकी नीली पड़ चुकी आंखें किसी खौफनाक सच बयां कर रही थीं। उनके शरीर पर चोट या हाथापाई का कोई बाहरी निशान मौजूद नहीं था, जिससे जहर दिए जाने का गहरा शक पैदा हो रहा था। कार्तिकेयन ने बड़ी सावधानी से पूरी मेज की तलाशी ली, जहां चाय का एक आधा खाली कप और कुछ बिखरे हुए जरूरी कागजात पड़े हुए थे।
तभी कार्तिकेयन की नजर मेज के नीचे कोने में पड़ी एक छोटी सी फटी हुई नीली डायरी के पन्ने पर गई, जिस पर अजीबोगरीब कोड लिखे हुए थे। उस फटे हुए पन्ने पर मलयालम और तमिल के कुछ मिले-जुले अक्षरों के साथ ‘संख्या ४१ और ७’ अंकित की गई थी, जो किसी गुप्त तिजोरी का पासवर्ड लग रही थी। कार्तिकेयन ने उस पन्ने को प्लास्टिक के बैग में सुरक्षित रखते हुए मन ही मन सोचा कि यह साधारण मर्डर नहीं, बल्कि किसी बड़ी गहरी साजिश का हिस्सा है।
जांच को आगे बढ़ाते हुए इंस्पेक्टर कार्तिकेयन ने सबसे पहले राघवन के परिवार के सदस्यों और उनके करीबी लोगों को पूछताछ के लिए बंगले के मुख्य हॉल में बुलाया। संदिग्धों की सूची में सबसे पहला नाम राघवन का सौतेला भाई, मुथु चेट्टीयार था, जो कर्ज में डूबा हुआ था और लंबे समय से जायदाद में अपना आधा हिस्सा मांग रहा था। मुथु का चेहरा पुलिस को देखकर लगातार पीला पड़ रहा था और वह बार-बार अपनी जेब से रुमाल निकालकर माथे का पसीना पोंछ रहा था।
दूसरा संदिग्ध राघवन का पुराना और वफादार मैनेजर, थंगराज था, जो पिछले तीस सालों से उनके चाय बागानों का पूरा हिसाब-किताब और वित्तीय लेन-देन संभाल रहा था। थंगराज बेहद शांत स्वभाव का बुजुर्ग व्यक्ति था, लेकिन कार्तिकेयन को उसकी आंखों में एक अजीब सा डर और छिपा हुआ गहरा राज साफ महसूस हो रहा था। तीसरी संदिग्ध राघवन की युवा और खूबसूरत मंगेतर, मीनाक्षी थी, जो इस अचानक हुई मौत की खबर सुनकर पूरी तरह सदमे में थी और लगातार रोए जा रही थी।
कार्तिकेयन ने अपनी तीखी और सधी हुई आवाज में मुथु से उसकी रात की गतिविधियों के बारे में कड़ाई से पूछताछ शुरू की, तो उसने घबराते हुए लड़खड़ाती जुबान में जवाब दिया। मुथु ने दावा किया कि वह पूरी रात ऊटी के मशहूर ‘क्लब महिंद्रा रिजॉर्ट’ के बार में अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पी रहा था और वहां के कैमरे उसकी गवाही दे सकते हैं। हालांकि, कार्तिकेयन को उसकी बातों पर पूरी तरह भरोसा नहीं हुआ क्योंकि मुथु के जूतों पर लगी ताजी लाल मिट्टी कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी।
जब मैनेजर थंगराज की बारी आई, तो उसने बेहद संभलकर और नपे-तुले शब्दों में बताया कि वह रात को करीब नौ बजे राघवन चेट्टीयार को जरूरी फाइलें देकर अपने घर चला गया था। उसने यह भी जोड़ा कि राघवन उस वक्त किसी बेहद जरूरी फोन कॉल पर किसी से ऊंची आवाज में बहस कर रहे थे, लेकिन वह शख्स कौन था, यह उसे नहीं पता। मीनाक्षी ने रोते हुए बताया कि राघवन पिछले कुछ दिनों से बेहद डरे हुए थे और कह रहे थे कि उनके अतीत का कोई पुराना साया उन्हें बर्बाद करने आ रहा है।
कार्तिकेयन ने बंगले के हर कोने को बारीकी से खंगालने का फैसला किया और वे राघवन के निजी शयनकक्ष की तरफ बढ़े, जहां हर चीज करीने से सजी हुई थी। अलमारी के पीछे छुपाकर रखी गई एक तिजोरी को देखकर कार्तिकेयन के दिमाग की बत्ती जली और उन्होंने उस नीली डायरी के कोड ‘४१ और ७’ का इस्तेमाल करके उसे खोलने की कोशिश की। तिजोरी के खुलते ही उसके अंदर से करोड़ों के हीरे या पैसे नहीं, बल्कि बीस साल पुराने कोयम्बटूर के एक मशहूर बैंक डकैती के कुछ गुप्त दस्तावेज मिले।
उन दस्तावेजों को पढ़ते ही कार्तिकेयन के पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उस डकैती में राघवन चेट्टीयार मुख्य आरोपी थे, लेकिन वे कानून की नजरों से बच निकले थे। उस फाइल में दो और लोगों के नाम शामिल थे जिन्हें पूरी तरह मिटाने की कोशिश की गई थी, लेकिन स्याही के नीचे छिपे अक्षरों को ध्यान से देखने पर ‘एम’ और ‘टी’ साफ नजर आ रहे थे। कार्तिकेयन समझ गए कि राघवन की मौत का ताल्लुक इस बीस साल पुराने उस काले अतीत से है, जिसका बदला लेने कोई वापस आया था।
रहस्यमयी नीली डायरी part-2

केस अब पूरी तरह एक नया और बेहद पेचीदा मोड़ ले चुका था क्योंकि यह महज संपत्ति का विवाद नहीं, बल्कि दो दशक पुराने बदले की खूनी दास्तान बन चुका था। कार्तिकेयन ने फॉरेंसिक रिपोर्ट की मांग की, जिसने पुष्टि कर दी कि राघवन की मौत किसी आम जहर से नहीं, बल्कि नीलगिरि के जंगलों में पाए जाने वाले एक दुर्लभ जहरीले पौधे ‘एकॉनाइट’ के अर्क से हुई थी। यह जहर इतनी खामोशी से असर करता है कि इंसान को संभलने का मौका भी नहीं मिलता और दिल की धड़कनें पूरी तरह रुक जाती हैं।
इस नई जानकारी के साथ कार्तिकेयन ने उस रात की कॉल डिटेल्स खंगाली, जिससे पता चला कि राघवन को आखिरी फोन कॉल किसी पीसीओ से आया था जिसका लोकेशन नीलगिरि रेलवे स्टेशन के पास था। स्टेशन के उस पीसीओ के पास पूछताछ करने पर एक चाय वाले ने बताया कि उस रात रेनकोट पहने एक लंबे कद के शख्स को वहां फोन करते देखा गया था। उस शख्स की कद-काठी और चलने का अंदाज हूबहू राघवन के सौतेले भाई मुथु चेट्टीयार से काफी हद तक मेल खाता था।
कार्तिकेयन ने मुथु को दोबारा हिरासत में लिया और उसके जूतों पर लगी लाल मिट्टी की जांच फॉरेंसिक लैब में कराई, जो हूबहू राघवन के बंगले के पिछले हिस्से के बगीचे की मिट्टी से मैच हो गई। जब पुलिस ने मुथु पर दबाव बनाया, तो उसने टूटकर स्वीकार किया कि वह उस रात राघवन की तिजोरी से वह पुरानी फाइल चुराने आया था ताकि वह उसे ब्लैकमेल कर सके। लेकिन मुथु ने कसम खाकर कहा कि जब वह खिड़की के रास्ते कमरे में दाखिल हुआ, तो राघवन पहले ही कुर्सी पर मृत पड़े हुए थे।
मुथु के इस चौंकाने वाले बयान ने कार्तिकेयन को सोचने पर मजबूर कर दिया क्योंकि अगर मुथु ने कत्ल नहीं किया, तो फिर बंद कमरे के भीतर जहर किसने और कैसे पहुंचाया। कार्तिकेयन ने एक बार फिर से राघवन के स्टडी रूम का मुआयना करने का फैसला किया और इस बार उनका ध्यान कमरे के कोने में रखे उस बड़े रूम हीटर पर गया। सर्दी के कारण वह हीटर पूरी रात चालू था और उसके वेंटिलेशन पाइप के पास कुछ अजीब से चिपचिपे अवशेष और जहरीले पौधे की पत्तियां जली हुई हालत में मिलीं।
कार्तिकेयन के दिमाग में अचानक पूरी साजिश का पूरा खाका साफ हो गया कि हत्यारे ने कमरे के अंदर कदम रखे बिना ही इस खौफनाक वारदात को बेहद चालाकी से अंजाम दिया था। हत्यारे ने रूम हीटर के हीटिंग एलिमेंट के भीतर उस जहरीले पौधे का अर्क डाल दिया था, जो हीटर चालू होते ही भाप बनकर पूरे कमरे की हवा में धीरे-धीरे फैल गया। राघवन ने अनजाने में उस जहरीली हवा को सांस के जरिए अपने फेफड़ों में खींच लिया और बिना किसी शोर या हाथापाई के उनकी मौत हो गई।
इस शातिर तरकीब को केवल वही अंजाम दे सकता था जिसे बंगले के हीटर सिस्टम और राघवन की हर छोटी-बड़ी आदत के बारे में पूरी और पुख्ता जानकारी हो। कार्तिकेयन ने तुरंत थंगराज और मीनाक्षी को आमने-सामने बिठाया और कड़कती आवाज में कहा कि खेल अब पूरी तरह खत्म हो चुका है और कातिल का मुखौटा उतरने वाला है। उन्होंने थंगराज की तरफ देखते हुए कहा कि बीस साल पहले कोयम्बटूर बैंक डकैती में शामिल तीसरा शख्स ‘टी’ यानी थंगराज तुम खुद थे।
थंगराज ने हंसते हुए कहा कि इंस्पेक्टर आपके पास मेरे खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है क्योंकि मैं तो रात नौ बजे ही अपने घर के लिए निकल चुका था। कार्तिकेयन ने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक पुराना अखबार निकाला और कहा कि थंगराज, तुम भूल गए कि तुमने बीस साल पहले जिस असली थंगराज की पहचान चुराई थी, वह असल में मीनाक्षी का सगा पिता था। मीनाक्षी ने चौंककर कार्तिकेयन की तरफ देखा, क्योंकि उसे भी इस खौफनाक और गहरे सच का जरा सा भी अंदाजा नहीं था।
कार्तिकेयन ने असली सच से पर्दा उठाते हुए बताया कि राघवन और नकली थंगराज ने मिलकर मीनाक्षी के पिता को बैंक डकैती के बाद मारकर उसकी लाश को खाई में फेंक दिया था। मीनाक्षी इस बंगले में राघवन से प्यार के कारण नहीं, बल्कि अपने पिता के गायब होने का सच जानने और अपनी मां की मौत का बदला लेने के इरादे से मंगेतर बनकर आई थी। लेकिन असली ट्विस्ट यह था कि कत्ल न तो मुथु ने किया था, न ही नकली थंगराज ने और न ही बेकसूर मीनाक्षी ने।
सभी लोग हैरान थे कि अगर इन तीनों में से कोई कातिल नहीं है, तो फिर इस बेहद शातिर मर्डर को अंजाम देने वाला चौथा शख्स कौन हो सकता है। कार्तिकेयन ने हॉल के दरवाजे की तरफ इशारा किया जहां से राघवन का सबसे वफादार और गूंगा रसोइया, चिन्नैया व्हीलचेयर पर चाय लेकर आ रहा था। कार्तिकेयन ने कहा कि यह चिन्नैया कोई मामूली रसोइया नहीं, बल्कि बीस साल पुरानी डकैती का असली मास्टरमाइंड और मीनाक्षी का सगा पिता है जो मरा नहीं था।
चिन्नैया ने बैसाखी फेंककर अपने पैरों पर खड़े होते हुए एक गहरी सांस ली और अपनी झूठी गूंगेपन की एक्टिंग को छोड़कर बेहद भारी आवाज में बोलना शुरू किया। उसने बताया कि राघवन और थंगराज ने उसे मरा हुआ समझकर खाई में फेंक दिया था, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी लेकिन वह बच गया था। उसने अपना चेहरा और पहचान बदलकर इस बंगले में रसोइए की नौकरी की ताकि वह सही वक्त आने पर इन दोनों गद्दारों से अपना बदला पूरा कर सके।
उसने ही उस रात हीटर में जहर मिलाया था और राघवन की मौत के बाद उसकी नीली डायरी के पन्ने फाड़कर मुथु को फंसाने की साजिश रची थी। चिन्नैया ने अपना जुर्म कबूल करते हुए कहा कि उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है क्योंकि उसने अपने साथ हुए अन्याय का हिसाब चुकता कर दिया है। कार्तिकेयन ने भारी मन से चिन्नैया के हाथों में हथकड़ी पहनाई और इस तरह ओटी की पहाड़ियों में छिपी बीस साल पुरानी खूनी दास्तान का सनसनीखेज अंत हुआ।