परछाई का षड्यंत्र Part 1
डॉ. कबीर मेहरा शहर के सबसे मशहूर और काबिल न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट थे, जिनका दिमाग इंसानी फितरत और दिमागी बीमारियों की पेचीदगियों को समझने में उस्ताद माना जाता था। उनके पास बड़े से बड़े पेचीदा केस आते थे, जिन्हें वे अपनी खास थेरेपी और शांत स्वभाव से चुटकियों में सुलझा दिया करते थे। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से कबीर की खुद की जिंदगी एक अजीब से अंधेरे कुएं में गिरती जा रही थी, जहां उन्हें हर वक्त किसी अनजाने साये का अहसास होता था।
उनके आलीशान और सुनसान बंगले में आधी रात को अचानक कदमों की आवाजें गूंजने लगती थीं, और जब वे उठकर देखते, तो वहां सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं मिलता था। इस अजीब सी पहेली ने कबीर के तार्किक दिमाग को हिलाकर रख दिया था, और वे पहली बार खुद को एक साइकोलॉजिस्ट नहीं बल्कि एक लाचार मरीज की तरह महसूस करने लगे थे।
कबीर की इस बढ़ती बेचैनी और पैरानोइया की शुरुआत तब हुई थी, जब उनके क्लिनिक में समर नाम का एक बेहद रहस्यमयी और शांत मरीज आया था। समर की आंखें गहरी और शून्य थीं, जिनमें एक अजीब सी चमक थी जो कबीर को अंदर तक झकझोर देती थी, मानो वह कोई आम मरीज न होकर कोई शैतान हो।
समर ने पहली ही मुलाकात में कबीर से कहा था कि वह अपनी याददाश्त के उन हिस्सों से डरता है, जो रात को जागते हैं और उसे अपनों के ही कत्ल करने की हिदायत देते हैं। कबीर ने इसे एक गंभीर सिज़ोफ्रेनिया का केस समझा और उसकी थेरेपी शुरू कर दी, लेकिन धीरे-धीरे कबीर को लगने लगा कि समर उनके बारे में कुछ बहुत गहरा और डरावना राज जानता है। समर की हर बात, उसका उठना-बैठना और उसकी मुस्कान कबीर के दिमाग के अंदर एक अनजाना डर पैदा करने लगी थी, जिसे वे चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर पा रहे थे।
एक शाम जब कबीर अपने केबिन में अकेले बैठे समर की केस फाइल्स को दोबारा खंगाल रहे थे, तो उन्हें अलमारी के पीछे एक पुराना टेप रिकॉर्डर मिला। उस टेप को चालू करते ही कमरे में जो आवाज गूंजी, उसने कबीर के माथे पर पसीने की बूंदें ला दीं, क्योंकि वह आवाज किसी और की नहीं बल्कि खुद कबीर की थी।
उस रिकॉर्डिंग में कबीर खुद से बातें कर रहे थे और किसी अदृश्य इंसान को यह समझा रहे थे कि गुनाह को छुपाने का सबसे बेहतरीन तरीका उसे भूल जाना है। कबीर को याद ही नहीं था कि उन्होंने ऐसा कोई टेप कभी रिकॉर्ड भी किया था या उनकी जिंदगी में ऐसा कोई स्याह पल आया था जिसे उन्होंने छुपाया हो। दिमाग का यह गहरा विरोधाभास और खुद की ही आवाज का यह खौफनाक राज कबीर को धीरे-धीरे पागलपन की उस दहलीज पर धकेल रहा था जहां से लौटना नामुमकिन था।
कबीर ने इस पहेली को सुलझाने के लिए अपनी सबसे पुरानी दोस्त और फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. अंजलि की मदद लेने का फैसला किया, जो उनके कॉलेज के दिनों से उनके साथ थी। अंजलि ने जब कबीर की हालत देखी और उनकी बातें सुनीं, तो उसने कबीर को आराम करने की सलाह दी और कहा कि यह सब सिर्फ काम के बढ़ते दबाव और नींद की कमी की वजह से हो रहा है।
लेकिन कबीर का शक अब अंजलि पर भी जाने लगा था, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि अंजलि और समर मिलकर उनके खिलाफ कोई बहुत बड़ा दिमागी खेल खेल रहे हैं। कबीर को अपने ही घर में रखी हर चीज नकली लगने लगी थी, यहां तक कि दवाओं की बोतलें, पानी का गिलास और दीवारों पर टंगी तस्वीरें भी उन्हें अपनी तरफ हंसती हुई महसूस होती थीं। उनके दिमाग में यह बात बैठ गई थी कि कोई उनके अतीत के पन्नों को बदलकर उनकी पूरी पहचान को ही मिटा देना चाहता है।
सस्पेंस और डर का यह माहौल तब और गहरा गया जब कबीर को अपने ही बेडरूम के शीशे पर लिपस्टिक से लिखा हुआ एक संदेश मिला, जिसमें लिखा था, “तुमने अपनी आखरी गलती को कहां दफनाया है, कबीर?” इस संदेश को देखते ही कबीर के दिमाग में एक ऐसी चीख गूंज उठी जो उनके वजूद को हिलाकर रख गई, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी उन्हें वह चेहरा याद नहीं आ रहा था जो इस संदेश से जुड़ा था।
कबीर ने तुरंत अपने घर के सारे सीसीटीवी फुटेज चेक किए, लेकिन फुटेज में उस वक्त सिर्फ कबीर ही कमरे में आते-जाते दिख रहे थे, कोई दूसरा इंसान वहां मौजूद नहीं था। इस खौफनाक खुलासे ने कबीर को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वे खुद ही रात के अंधेरे में यह सब कर रहे हैं या फिर कोई तकनीक के जरिए उनके साथ खेल रहा है। वे अपनी ही परछाई से डरने लगे थे और कमरे के हर कोने में उन्हें किसी की सांसों की आहट सुनाई देती थी।
परछाई का षड्यंत्र Part 2

भ्रम और हकीकत की इस खूनी जंग में कबीर ने तय किया कि वे समर को उसके घर जाकर खुद रंगे हाथों पकड़ेंगे और इस पूरे खेल का अंत करेंगे जो उनके दिमाग को खोखला कर रहा था। जब कबीर समर के दिए गए पते पर पहुंचे, तो वह शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक खंडहर नुमा और वीरान सा मकान था, जहां चारों तरफ धूल और मकड़ी के जाले लगे हुए थे।
घर के अंदर कदम रखते ही कबीर को एक तेज बदबू का अहसास हुआ, और जब उन्होंने टॉर्च की रोशनी में दीवारों को देखा, तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। दीवार पर कबीर की सैकड़ों तस्वीरें लगी हुई थीं, जिनमें उनके बचपन से लेकर अब तक की हर छोटी-बड़ी गतिविधि का पूरा ब्योरा और उनकी हर थेरेपी के नोट्स लिखे हुए थे। वहां एक बड़ी मेज पर एक और मेडिकल फाइल रखी थी, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था: “मरीज नंबर ४०४ – डॉ. कबीर मेहरा।”
कबीर ने कांपते हाथों से उस फाइल को खोला और जैसे-जैसे वे उसके पन्ने पलटते गए, उनका पूरा ब्रह्मांड एक पल में बिखर गया और उनका खुद का वजूद एक छलावा साबित हो गया। उस फाइल के मुताबिक, समर नाम का कोई मरीज असल में वजूद में था ही नहीं, बल्कि समर खुद कबीर के दिमाग की एक ऐसी काल्पनिक रचना थी जिसे उन्होंने एक भयानक सच से बचने के लिए पैदा किया था।
फाइल में दर्ज रिपोर्ट्स के अनुसार, पांच साल पहले कबीर ने एक कार एक्सीडेंट में अपनी पत्नी और मासूम बच्चे को खो दिया था, जिसके जिम्मेदार वे खुद थे क्योंकि वे नशे में गाड़ी चला रहे थे। उस भयानक सदमे और गिल्ट को कबीर का दिमाग बर्दाश्त नहीं कर सका, और उनके न्यूरॉन्स ने खुद को बचाने के लिए एक प्रोटेक्टिव मैकेनिज्म तैयार किया, जिसने उस पूरे हादसे की याद को ही उनके दिमाग से पूरी तरह डिलीट कर दिया था।
तभी उस अंधेरे कमरे के दरवाजे पर एक साया उभरा, और जब कबीर ने मुड़कर देखा, तो वहां डॉ. अंजलि खड़ी थी, लेकिन उसकी आंखों में इस बार सहानुभूति नहीं बल्कि एक गहरा और शातिर संतोष था। अंजलि ने मुस्कुराते हुए कबीर से कहा कि वे जिस सच को ढूंढ रहे हैं, वह कभी खोया ही नहीं था, बल्कि उसे एक खास मेडिकल थेरेपी के जरिए जानबूझकर दबाया गया था।
अंजलि ने खुलासा किया कि वह पिछले पांच सालों से कबीर को एक ऐसी प्रायोगिक दवा दे रही थी जो इंसान की यादों को रीराइट कर सकती थी, ताकि कबीर सामान्य जिंदगी जी सकें। लेकिन अंजलि का असली मकसद कबीर का इलाज करना नहीं था, बल्कि वह कबीर के उस आलीशान बंगले, उनकी करोड़ों की प्रॉपर्टी और उनके रिसर्च वर्क को हड़पना चाहती थी, जिसके लिए कबीर का पूरी तरह मानसिक रूप से विक्षिप्त होना जरूरी था।
इस खौफनाक खुलासे ने कबीर के सामने पूरी तस्वीर साफ कर दी कि अंजलि ने ही समर नाम के उस कैरेक्टर को कबीर के दिमाग में ट्रिगर करने के लिए उनके कमरे में वो टेप और शीशे पर संदेश छोड़े थे। अंजलि ने कबीर के अवचेतन मन के साथ इस तरह खिलवाड़ किया था कि कबीर खुद को ही अपना दुश्मन समझने लगे थे और अपने ही बनाए भ्रम के जाल में फंसते चले गए।
कबीर को समझ आ गया था कि उनकी इस हालत का असली मास्टरमाइंड कोई और नहीं बल्कि उनकी सबसे भरोसेमंद दोस्त अंजलि ही थी, जो उन्हें पागलखाने भेजने की पूरी तैयारी कर चुकी थी। लेकिन कबीर का डॉक्टर वाला दिमाग अब भी पूरी तरह मरा नहीं था, और इस भयानक सच को जानने के बाद उनके अंदर का सोया हुआ न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट अचानक से जाग उठा।
कबीर ने एक गहरी सांस ली, अपनी आंखों के आंसू पोंछे और अंजलि की तरफ देखते हुए एक ऐसी ठंडी और डरावनी हंसी हंसे जिसने अंजलि को पहली बार अंदर से डरा दिया। कबीर ने अपनी जेब से एक छोटा सा वॉयस रिकॉर्डर निकाला और अंजलि को दिखाया, जिसमें अंजलि का यह पूरा कबूलनामा लाइव रिकॉर्ड हो चुका था और सीधे पुलिस हेडक्वार्टर को ब्रॉडकास्ट हो रहा था।
कबीर ने कहा कि वे जानते थे कि उनके साथ कोई दिमागी खेल खेल रहा है, इसलिए उन्होंने अंजलि के इस खंडहर तक आने से पहले ही पुलिस को इस पूरे खेल की भनक दे दी थी और अपने ऊपर एक हिडन कैमरा भी फिट कर रखा था। अंजलि का चेहरा खौफ से सफेद पड़ गया क्योंकि उसने कबीर के दिमाग को कमजोर समझा था, लेकिन वह यह भूल गई थी कि एक घायल शेर का दिमाग सबसे ज्यादा खतरनाक होता है।
बाहर पुलिस की गाड़ियों के सायरन गूंजने लगे और अंजलि को सलाखों के पीछे ले जाया गया, जिससे इस खौफनाक दिमागी साजिश का अंत तो हो गया, लेकिन कबीर के लिए यह जीत अधूरी थी। अंजलि के पकड़े जाने के बाद भी कबीर जब अपने घर के आईने के सामने खड़े हुए, तो उन्हें आईने में अपना चेहरा नहीं बल्कि समर का वो रहस्यमयी चेहरा मुस्कुराता हुआ दिखाई दिया।
कबीर को अहसास हुआ कि भले ही अंजलि ने उनके दिमाग के साथ खेल खेला था, लेकिन समर का वजूद अब भी उनके अवचेतन मन के किसी गहरे कोने में पूरी तरह से जम चुका था। वे समझ गए थे कि वे अंजलि के चंगुल से तो आजाद हो चुके थे, लेकिन अपने ही दिमाग की उस भूलभुलैया से वे कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे, जहां उनका काल्पनिक साया हमेशा उनके साथ रहने वाला था।
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