राख से अंकुरित गुलाब

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राख से अंकुरित गुलाब part-1

नैना और रोहित की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी नहीं थी, बल्कि उसमें मुंबई के लोकल ट्रेनों की तरह एक ठसाठस भरी हुई सादगी थी। वे दोनों एक छोटी सी एडवरटाइजिंग एजेंसी में मिले थे, जहां नैना की कड़क कॉफी और रोहित के बेतरतीब आइडियाज ने मिलकर एक नई दुनिया बनाई थी।

उनकी शादी को अभी केवल तीन ही साल हुए थे कि नैना को एक दुर्लभ जेनेटिक लिवर की बीमारी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। देखते ही देखते, उसकी आंखों की वह चुलबुली चमक गायब हो गई और उसकी जगह एक खामोश दर्द ने ले ली, जिसे वह रोहित से छुपाने की नाकाम कोशिश करती थी। रोहित ने अपनी जमा-पूंजी, अपना छोटा सा फ्लैट और यहां तक कि अपना स्वाभिमान भी दांव पर लगा दिया था, ताकि वह नैना को बचा सके।

“रोहित, तुम कब तक इस तरह खुद को सजा देते रहोगे? डॉक्टर ने कहा है कि अगर अगले अड़तालीस घंटों में डोनर नहीं मिला, तो…” रोहित की छोटी बहन मीरा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, उसकी आवाज भारी थी। मीरा अपनी कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर पिछले छह महीनों से रोहित के साथ साए की तरह खड़ी थी, अस्पताल के चक्कर काटना और भाई को संभालना ही अब उसकी जिंदगी बन चुका था।

रोहित ने बिना मुड़े सिर्फ इतना कहा, “वह मुझे छोड़कर नहीं जा सकती मीरा, उसने वादा किया था कि हम बूढ़े होने तक साथ में मरीन ड्राइव पर वड़ा पाव खाएंगे, वह अपना वादा कभी नहीं तोड़ती।” मीरा ने अपने भाई की पीठ को सहलाया, क्योंकि वह जानती थी कि इस वक्त दिलासा के शब्द भी घाव की तरह चुभते हैं।

तभी रोहित के फोन की घंटी बजी, स्क्रीन पर अस्पताल के डॉक्टर मेहता का नाम चमक रहा था और रोहित का दिल एक पल के लिए थम गया। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया, तो दूसरी तरफ से डॉक्टर की गंभीर आवाज आई, “रोहित, तुरंत हॉस्पिटल पहुंचो, हमें एक डोनर मिल गया है, एक ब्रेन-डेड मरीज के परिवार ने अंगदान के लिए हामी भर दी है।”

यह खबर सुनते ही रोहित के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई, उसमें एक साथ राहत, घबराहट और एक अजीब सा डर उमड़ पड़ा। वह और मीरा तुरंत एक ऑटो में बैठे और बारिश को चीरते हुए केईएम अस्पताल की तरफ भागे, जहां नैना का भविष्य तय होने वाला था।

अस्पताल के गलियारे में सफेद रोशनी और फिनाइल की गंध हमेशा की तरह दमघोंटू थी, लेकिन आज वहां एक अलग तरह की हलचल थी। ऑपरेशन थिएटर के बाहर एक बुजुर्ग दंपत्ति बैठे रो रहे थे, जिनके इकलौते जवान बेटे का एक्सीडेंट हुआ था और उन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे बड़े काले दिन पर किसी और को जिंदगी देने का फैसला किया था।

रोहित उनके पास गया, उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे, उसने बस उस बूढ़े बाप के हाथ थाम लिए और अपनी आंखें झुका लीं। उस पिता ने रोहित के सिर पर हाथ रखा और रुंधे गले से कहा, “मेरा बेटा तो चला गया बेटा, लेकिन तुम्हारी पत्नी के रूप में वह इस दुनिया को देखता रहेगा, उसे संभालना।”

ऑपरेशन पूरे आठ घंटे चला, जिसके दौरान रोहित ने अपनी जिंदगी का हर एक पल ईश्वर से मिन्नतें करने में गुजार दिया। जब डॉक्टर मेहता बाहर आए, तो उनके चेहरे के ढीले पड़े मास्क के पीछे एक थकी हुई लेकिन संतोषजनक मुस्कान थी, जिसने रोहित की जान में जान ला दी। डॉक्टर ने बताया कि ट्रांसप्लांट सफल रहा है, लेकिन असली चुनौती नैना के शरीर द्वारा इस नए अंग को स्वीकार करने और उसके मानसिक रूप से इस सदमे से उबरने की थी।

रोहित कांच की खिड़की से नैना को देखने लगा, जिसके शरीर से अनगिनत नलियां जुड़ी हुई थीं, वह बेसुध थी लेकिन उसकी सांसों की लय अब पहले से ज्यादा मजबूत और स्थिर लग रही थी।

राख से अंकुरित गुलाब part-1

राख से अंकुरित गुलाब

सर्जरी के तीन हफ्ते बाद नैना को आखिरकार जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया, लेकिन उसका असली संघर्ष अब शुरू होना था। वह शारीरिक रूप से तो ठीक हो रही थी, लेकिन उसके मन पर इस पूरी प्रक्रिया का एक गहरा और खामोश अवसाद छा गया था। जब उसे पता चला कि उसकी रगों में किसी और की दी हुई जिंदगी धड़क रही है और इसके लिए रोहित ने अपना सब कुछ बेच दिया है, तो वह एक अजीब से अपराध बोध (गिल्ट) में डूब गई। वह घंटों खिड़की के बाहर बांद्रा-वर्ली सी लिंक को देखती रहती और रोहित से बमुश्किल दो-चार शब्द ही बात करती, जिससे रोहित का दिल अंदर ही अंदर टूटने लगा था।

“तुमने मेरे लिए इतना बड़ा बलिदान क्यों दिया रोहित? मैं इस अहसान के बोझ तले दबकर नहीं जी सकती, तुमने अपना करियर, अपना घर सब कुछ खो दिया,” एक शाम नैना ने रोते हुए अपनी भड़ास निकाली। रोहित ने उसके कमजोर हाथों को अपने मजबूत हाथों में लिया, उसकी आंखों में देखते हुए बेहद शांति से कहा, “नैना, प्यार में कोई अहसान नहीं होता और न ही कोई सौदा होता है।

अगर तुम्हारी जगह मैं होता, तो क्या तुम मुझे ऐसे ही छोड़ देती? यह घर, यह पैसा तो हम फिर से कमा लेंगे, लेकिन अगर तुम न होती तो इस रोहित का कोई वजूद ही नहीं बचता।” नैना ने अपना सिर रोहित के सीने पर रख दिया और महीनों बाद वह खुलकर रोई, जिससे उसका भारीपन धीरे-धीरे पिघलने लगा।

पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने ने इस भावनात्मक घाव को भरने में एक मलहम की तरह काम किया, खासकर मीरा के निस्वार्थ स्वभाव ने। मीरा हर रोज नैना के लिए उसकी पसंद का सूप बनाती, उसे पुरानी कॉमिक्स पढ़कर सुनाती और घर के माहौल को हमेशा हल्का रखने की कोशिश करती।

एक दिन जब नैना ने मीरा से माफी मांगी कि उसकी वजह से मीरा की पढ़ाई का नुकसान हुआ, तो मीरा ने हंसकर कहा, “भाभी, डिग्री तो अगले साल भी मिल जाएगी, लेकिन आपकी यह डांट सुनने के लिए मैं तरस गई थी, अब जल्दी से ठीक हो जाओ ताकि हम शॉपिंग पर जा सकें।” इस अपनेपन ने नैना के भीतर जीने की इच्छा को फिर से जगा दिया, जो कहीं खो गई थी।

जैसे-जैसे महीने गुजरे, नैना की सेहत में सुधार साफ दिखने लगा, उसने धीरे-धीरे घर के छोटे-मोटे काम करना और पेंटिंग करना दोबारा शुरू कर दिया। रोहित ने भी एक नई एजेंसी में फ्रीलांस काम करना शुरू कर दिया था, और हालांकि आर्थिक तंगी अभी भी थी, लेकिन उनके छोटे से किराए के घर में अब खुशियों की गूंज वापस आने लगी थी।

एक रविवार की सुबह, रोहित ने नैना को सरप्राइज देने के लिए उसके कमरे की दीवार पर वह पेंटिंग टांग दी जो नैना ने बीमारी से ठीक पहले अधूरी छोड़ दी थी। नैना ने जब उस कैनवास को देखा, तो उसकी आंखों में आंसू आ गए, लेकिन इस बार वे आंसू दुख के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के थे।

एक साल बाद, मुंबई की उसी मरीन ड्राइव पर शाम की ठंडी हवाएं चल रही थीं और आसमान में ढलते सूरज की लालिमा बिखरी हुई थी। रोहित और नैना एक दूसरे का हाथ थामे टहल रहे थे, नैना के गालों पर अब बीमारी का पीलापन नहीं, बल्कि सेहत की गुलाबी रंगत लौट आई थी।

उन्होंने एक स्टॉल से वड़ा पाव खरीदा और उसी कंक्रीट की मुंडेर पर बैठ गए, जहां कभी रोहित ने अकेले खड़े होकर आंसू बहाए थे। नैना ने रोहित के कंधे पर अपना सिर टिकाया और कहा, “तुम्हारे प्यार ने मुझे एक नया जन्म दिया है रोहित, अब मुझे लगता है कि हम किसी भी तूफान का सामना मिलकर कर सकते हैं।”

सूरज पूरी तरह से डूब चुका था और मुंबई की बत्तियां एक-एक करके जलने लगी थीं, जिससे समंदर का किनारा किसी हीरों के हार की तरह चमक रहा था। रोहित ने नैना की तरफ देखा और उसके माथे को धीरे से चूमते हुए कहा, “जिंदगी हमेशा हमें वैसी नहीं मिलती जैसी हम चाहते हैं, लेकिन तुम्हारे साथ होने से यह अधूरी धूप भी मुकम्मल लगती है।”

दोनों ने एक दूसरे का हाथ और कसकर पकड़ लिया, यह जानते हुए कि अतीत का दर्द अब पीछे छूट चुका है और उनके सामने उम्मीदों से भरा एक बेहद खूबसूरत और नया सवेरा खड़ा है।

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