ज़हरीले प्रेम की इबारत

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ज़हरीले प्रेम की इबारत part 1

दिल्ली की उमस भरी शाम में रिया अपनी बालकनी में खड़ी होकर नीचे सड़क पर दौड़ती लाल-पीली बत्तियों को देख रही थी। उसके हाथ में कॉफी का मग था, लेकिन वह कब की ठंडी हो चुकी थी, बिल्कुल उसके और राघव के उस रिश्ते की तरह जो अब सिर्फ ज़िद और जुनून के बोझ तले दबा हुआ था। राघव अंदर कमरे में लैपटॉप पर काम करने का दिखावा कर रहा था, लेकिन रिया जानती थी कि वह उसकी हर एक हरकत पर नज़र रखे हुए है।

उसने खिड़की के कांच में राघव के चेहरे का अक्स देखा, जो इस वक्त बहुत शांत लग रहा था, लेकिन यह शांति उस तूफान से पहले की थी जो अक्सर उनके घर में बिना किसी दस्तक के आता था। यह रिश्ता पहली बार में किसी परीकथा जैसा लगा था, जहाँ राघव की देखभाल और उसका ध्यान रिया को दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह महसूस कराता था, लेकिन धीरे-धीरे वह सुरक्षा एक पिंजरे में तब्दील हो गई थी।

रिया ने अंदर मुड़कर राघव की ओर देखा, जिसने अपना लैपटॉप बंद कर दिया था और अब वह एक शिकारी की तरह उसकी ओर देख रहा था। राघव की आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जो प्यार से ज्यादा अधिकार जताने वाली थी, जैसे वह यह सोचने के लिए मजबूर कर रहा हो कि क्या रिया ने आज किसी से बात की या क्या उसने किसी और को देखा।

राघव के लिए रिया सिर्फ एक इंसान नहीं थी, बल्कि एक ऐसी जागीर थी जिस पर उसका पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए था, और इस नियंत्रण को बनाए रखने के लिए वह किसी भी हद तक गिर सकता था। रिया को याद आया कि कैसे पिछले महीने एक सामान्य सी ऑफिस पार्टी में जाने के लिए उसने तीन दिन तक राघव के ताने सुने थे, जहाँ राघव ने उसे यह एहसास दिलाने की कोशिश की थी कि रिया के बिना उसका अस्तित्व ही नहीं है और वह बाहर की दुनिया के लिए सिर्फ एक खिलौना है।

“तुमने आज फिर अपनी फोटो इंस्टाग्राम पर नहीं डाली, क्या बात है, रिया?” राघव की आवाज़ कमरे की सन्नाटे को चीरते हुए आई, जिसमें एक तीखी चुभन थी। रिया ने एक गहरी सांस ली और उसे शांत करने की कोशिश की, क्योंकि वह जानती थी कि अगर उसने बहस की तो बात फिर कल तक खिंचेगी और उसे ऑफिस में अपनी परफॉरमेंस पर ध्यान देना मुश्किल हो जाएगा।

उसने मुस्कुराते हुए कहा कि वह बस व्यस्त थी, लेकिन राघव ने उठकर उसके पास आकर उसका चेहरा अपने हाथों में जकड़ लिया। उसकी पकड़ में वह प्यार कम और मालिक वाला भाव ज़्यादा था, जो रिया को अंदर तक हिला देता था, पर वह इस आदत का शिकार हो चुकी थी कि उसे इसी दर्द में प्यार ढूंढना था। राघव ने धीरे से उसके कान में फुसफुसाया कि अगर वह उसे छोड़कर जाने की कोशिश करेगी, तो वह उसे ढूंढ निकालेगा क्योंकि रिया का हर एक पल, हर एक सांस सिर्फ उसकी मर्जी पर चलती है।

रिया ने महसूस किया कि उसकी आंखों से आंसू गिरने ही वाले थे, लेकिन उसने उन्हें रोक लिया क्योंकि राघव को उसके आंसुओं पर काबू पाना पसंद था, जैसे वह उसके दर्द का आनंद लेता हो। उसने राघव के हाथ को हटाकर खुद को छुड़ाया और किचन की तरफ चली गई, जहां अंधेरा था, ठीक वैसा ही जैसा उसका मन हो चुका था।

उसने पानी का गिलास भरा और अपने कांपते हाथों को देखा, जो अब सामान्य नहीं रहे थे; यह घबराहट और डर की एक स्थायी छाप थी जो राघव ने उस पर छोड़ दी थी। रिया को याद आया कि कैसे पहले वह दिल्ली की सड़कों पर बेखौफ घूमती थी, अपनी सहेलियों के साथ देर रात तक हंसती थी, लेकिन अब उसे अपने घर के अंदर भी राघव की परछाई से डर लगता था। यह कैसी मोहब्बत थी, उसने खुद से पूछा, जहां खुद को जिंदा रखने के लिए भी उसे झूठ का सहारा लेना पड़ता था और अपनी खुशी को एक अंधे कमरे में दबाना पड़ता था।

राघव पीछे से आकर उसके करीब खड़ा हो गया, उसकी सांसें रिया की गर्दन पर महसूस हो रही थीं, जो अब उसे सुकून के बजाय घुटन का एहसास दिला रही थीं। उसने रिया को पीछे से गले लगाया, लेकिन यह आलिंगन एक जकड़न जैसा था, जिसमें ऑक्सीजन की कमी थी। उसने रिया से पूछा कि क्या उसे याद है कि पहली मुलाकात में उन्होंने क्या वादे किए थे, कि वे कभी एक-दूसरे से झूठ नहीं बोलेंगे और हमेशा एक-दूसरे के साथ रहेंगे।

रिया ने मन ही मन सोचा कि वे वादे अब एक ज़हर बन चुके हैं; राघव का ‘साथ’ का मतलब था रिया का पूरी तरह मिट जाना और केवल राघव की परछाईं बनकर रह जाना। उसने राघव की उंगलियों को अपने कंधों पर महसूस किया जो उसे गहराई से गड़ा रही थीं, शायद यह बताने के लिए कि वह कहीं नहीं जा सकती।

रात के सन्नाटे में रिया को बाहर से किसी की हंसी सुनाई दी, जो शायद पड़ोसी थे, और उसे अपने बीते हुए दिनों की याद आ गई। उसने सोचा कि वह क्या कर रही है, अपनी ज़िंदगी के सबसे सुनहरे साल एक ऐसे आदमी के नाम कर रही है जो उसे एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन फिर उसे डर लगा, क्या होगा अगर उसने राघव को छोड़ा?

क्या राघव उसे चैन से जीने देगा, या वह किसी पागल की तरह उसके पीछे पड़ जाएगा? रिया का मन दो हिस्सों में बंटा था, एक हिस्सा जो आज़ाद होना चाहता था और दूसरा जो राघव के बिना खुद को अधूरा और कमज़ोर मानता था, यह निर्भरता की वह बेड़ी थी जिसे तोड़ना अब नामुमकिन सा लग रहा था। उसने राघव की ओर मुड़कर एक फीकी मुस्कान दी और कहा कि उसे सब याद है, यह जानकर भी कि यह झूठ उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा गुनाह है।

ज़हरीले प्रेम की इबारत part 2

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अगले कुछ हफ्तों में रिया ने धीरे-धीरे खुद को राघव की नज़रों से बचाने के तरीके ढूंढ लिए थे, जो एक जासूस की तरह उसके फोन, उसके लैपटॉप और उसकी हर एक हरकत पर नज़र रख रहा था। उसने एक नया फोन सिम खरीद लिया था जिसे वह अपने ऑफिस के डेस्क के अंदर छुपाकर रखती थी, और यह छोटा सा राज़ उसे दिन भर एक अजीब सी खुशी देता था। एक दिन ऑफिस में उसने अपनी कॉलेज की एक दोस्त अनन्या को कॉल किया, जिसे उसने राघव के दबाव में तीन साल पहले छोड़ दिया था।

जैसे ही फोन उठा और अनन्या की आवाज़ आई, रिया की आंखों से आंसू छलक पड़े, क्योंकि उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह अभी भी जीवित है और दुनिया खत्म नहीं हुई है। अनन्या से बात करते हुए रिया को समझ आया कि कैसे राघव ने धीरे-धीरे उसे उसके अपनों से दूर करके उसकी दुनिया को सिर्फ खुद तक सीमित कर लिया था, ताकि वह अपनी ज़रूरत के हिसाब से उसे इस्तेमाल कर सके।

घर लौटते ही रिया ने अपना फोन बहुत सावधानी से छुपाया और चेहरे पर वह मास्क लगा लिया जो राघव को देखना पसंद था—एक ऐसी महिला जो सिर्फ राघव के लिए बनी है। राघव उस शाम थोड़ा अजीब लग रहा था, उसने रिया का फोन मेज पर रखा देखा और उसकी आंखों में एक खौफनाक संदेह तैरने लगा। उसने पूछा कि रिया का फोन बंद क्यों था और क्या वह फिर से किसी से छिपकर बात कर रही है, क्योंकि राघव को हमेशा शक रहता था कि कोई उसे रिया से दूर ले जाने की कोशिश कर रहा है।

रिया ने बहुत शालीनता से जवाब दिया कि फोन की बैटरी खत्म हो गई थी और वह सिर्फ काम के तनाव से दूर होने की कोशिश कर रही थी, लेकिन राघव ने उसे गुस्से में धक्का दे दिया। रिया दीवार से टकराई और उसके कंधे पर गहरा ज़ख्म हो गया, लेकिन दर्द से ज़्यादा उसे उस अपमान का दुख था जिसने उसकी रूह को छील दिया था।

राघव को अपने किए पर पछतावा हुआ या शायद उसने पछतावे का नाटक किया, क्योंकि वह रोते हुए रिया के पैरों में गिर गया और उससे माफी मांगने लगा। उसने कहा कि वह उसे बहुत प्यार करता है और उसका डर ही उसे पागल बना देता है, इसलिए वह रिया को खोने के डर से ऐसी हरकतें कर देता है। रिया उसे देखते हुए सोच रही थी कि यह भी उस खेल का हिस्सा है—पहले दर्द दो, फिर माफी मांगो, और फिर से वही सिलसिला शुरू करो।

उसने राघव को गले लगाया, लेकिन इस बार उसके आंसुओं में प्यार नहीं, बल्कि उस नफरत का उबाल था जो अब धीरे-धीरे एक फैसले में बदल रहा था। उसने जान लिया था कि राघव कभी नहीं बदलेगा, क्योंकि वह इंसान अपनी कमियों को प्यार का नाम देकर उसे ढकने का माहिर खिलाड़ी था।

अगले कुछ दिन रिया ने एक बहुत बड़े धोखे और अभिनय के साथ गुजारे, जहाँ उसने राघव को यकीन दिलाया कि वह पूरी तरह उसके नियंत्रण में है। उसने राघव की हर बात मानी, उसके फोन कॉल्स का इंतज़ार किया और उसके हर शक का बहुत तसल्ली से जवाब दिया, जिससे राघव को लगा कि उसने रिया को जीत लिया है। एक रात, जब राघव गहरी नींद में था, रिया ने अपनी ज़रूरी चीज़ें एक बैग में भरीं और बिना किसी शोर के घर से बाहर निकल गई।

दिल्ली की उस सुनसान रात में वह टैक्सी लेकर सीधे उस ठिकाने पर पहुंची जहाँ अनन्या ने उसे रुकने के लिए कहा था, उसके दिल की धड़कनें किसी ड्रम की तरह बज रही थीं। जब उसने अपने पुराने घर की चाबी से गेट खोला और अंदर कदम रखा, तो उसे लगा जैसे उसने एक लंबी सुरंग के बाद पहली बार सूरज की रोशनी देखी हो।

पीछे मुड़कर देखने पर उसे एहसास हुआ कि जो रिश्ता उसे एक मक़सद देता था, वह वास्तव में उसका अंत था। अगले दिन, जब राघव की आंख खुली और उसने घर को खाली पाया, तो उसका शोर पूरे अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में गूंज गया होगा, लेकिन रिया के लिए वह सब अब एक पुरानी फिल्म की तरह था जिसे वह देख रही थी। राघव ने उसे सैकड़ों बार फोन किए, उसके ऑफिस के बाहर हंगामा किया और उसे धमकाया, लेकिन रिया ने अनन्या की सलाह मानकर कानूनी मदद ली और अपनी सुरक्षा के लिए एक सख्त कदम उठाया।

धीरे-धीरे राघव का वह जुनून और उसकी ज़िद, जो कभी एक पहाड़ जैसी लगती थी, कमज़ोर पड़ने लगी क्योंकि अब उसके पास नियंत्रित करने के लिए कोई नहीं था। रिया को पता था कि यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, क्योंकि राघव जैसे लोग आसानी से हार नहीं मानते, लेकिन उसने अब अपनी ज़िंदगी की डोर अपने हाथों में थाम ली थी।

महीनों बाद, जब रिया एक कैफे में अपनी दोस्तों के साथ हंस रही थी, उसे दूर से राघव की परछाईं दिखाई दी, जो उसे कहीं दूर से देख रहा था। उसे पहली बार डर महसूस नहीं हुआ, बल्कि एक गहरी शांति महसूस हुई, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि वह अब उसकी शिकार नहीं है। राघव की आंखों में जो ज़हर था, वह अब रिया के लिए बेअसर हो चुका था, क्योंकि उसने खुद को उस मानसिक गुलामी से मुक्त कर लिया था।

उसने अपनी कॉफी का घूंट भरा और मुस्कुराकर अपनी सहेलियों की बातों में खो गई, क्योंकि अब वह जानती थी कि असली आज़ादी क्या होती है। कांच के टुकड़ों पर नृत्य करना उसने सीखा था, और अब वह उन टुकड़ों को अपने पैरों के नीचे कुचलकर एक नई राह पर चल पड़ी थी, जहां राघव का कोई वजूद नहीं था।

उसका अतीत एक धुंधले सपने जैसा रह गया था, लेकिन वह सपना जो उसे सिखा गया था कि खुद को प्यार करना कितना ज़रूरी है। राघव अभी भी शायद अपनी उसी पुरानी ज़िंदगी में उलझा हुआ था, दूसरों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन रिया के लिए वह अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया था।

यह सिर्फ एक रिश्ते के अंत की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी महिला के फिर से जन्म लेने की गाथा थी जिसने अपनी राख से खुद को एक बार फिर जिंदा किया था। दिल्ली की वही हवा अब उसे सुकून देने वाली लग रही थी, और वह उन सड़कों पर फिर से बिना किसी डर के चल सकती थी। उसने अपने फोन को बंद किया और खिड़की के बाहर देखा, जहां सूरज उग रहा था, एक नई सुबह, एक नया सफर, और एक ऐसी रिया जो अब किसी की मोहताज नहीं थी।

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