परछाइयों का जाल

परछाइयों का जाल

परछाइयों का जाल भाग 1 दिल्ली की चिलचिलाती दोपहर में कनॉट प्लेस की एक कॉफी शॉप के कोने में बैठे अर्जुन मल्होत्रा और काव्या शर्मा के बीच की खामोशी उस भारी उमस से भी ज्यादा दमघोंटू थी। अर्जुन एक उभरता हुआ आर्किटेक्ट था, जिसकी महत्वाकांक्षाएं उसकी रातों की नींद छीन चुकी थीं, जबकि काव्या एक … Read more

खोई हुई धड़कनें

खोई हुई धड़कनें

खोई हुई धड़कनें Part 1 यह कहानी उस वक्त की है जब ज़िंदगी का मतलब सिर्फ अच्छे नंबर लाना, दोस्तों के साथ कैफे में बैठना और भविष्य के बड़े-बड़े सपने देखना होता था। मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा था, जो खुद को बहुत समझदार मानती थी, लेकिन हकीकत में हम सब जज्बातों के समंदर … Read more

राख से अंकुरित गुलाब

राख से अंकुरित गुलाब

राख से अंकुरित गुलाब part-1 नैना और रोहित की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी नहीं थी, बल्कि उसमें मुंबई के लोकल ट्रेनों की तरह एक ठसाठस भरी हुई सादगी थी। वे दोनों एक छोटी सी एडवरटाइजिंग एजेंसी में मिले थे, जहां नैना की कड़क कॉफी और रोहित के बेतरतीब आइडियाज ने मिलकर एक नई दुनिया … Read more

जब रिश्तों की आवाज़ धीमी पड़ गई

काव्या: अधूरी मोहब्बत और बारिश की कहानी

भाग एक शाम की बारिश उस पुराने मकान की दीवारों से टकराकर एक अजीब सी आवाज़ पैदा कर रही थी, जैसे कोई बीती हुई याद बार-बार दरवाज़ा खटखटा रही हो और अंदर आने की जिद कर रही हो। आरव खिड़की के पास खड़ा दूर सड़क पर गिरती बारिश को देख रहा था, लेकिन उसकी आँखें … Read more

“वसीयत के उस एक पन्ने ने पूरे परिवार को दुश्मन बना दिया”

वसीयत

शुक्ला हवेली में एक वसीयत के सामने आते ही पूरे परिवार की नींव हिल जाती है। वर्षों से छिपे रिश्तों के सच, अपमान, धोखे और अधूरे दर्द धीरे-धीरे सबके सामने आने लगते हैं। अमन को पता चलता है कि जिस आदमी को वह पिता मानता रहा, वह उसका असली पिता ही नहीं है। परिवार के हर सदस्य के अंदर दबे जख्म बाहर आने लगते हैं और एक सच पूरे घर को टूटने के कगार पर ला खड़ा करता है।